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शिक्षा के मंदिर या कानूनी जंग का मैदान ? नए नियमों पर छात्रों की बढ़ती चिंता।

सर्वप्रथम न्यूज सौरभ कुमार : क्या जनरल कैटेगरी में पैदा होना गुनाह है? मोदी जी, एक रहेंगे, तो सेफ रहेंगे। हम सेफ क्यों नहीं है? 90% लाकर भी क्या उखाड़ लिया? अब तो कॉलेज में डर लगता है। बस एक झूठी शिकायत और मेरा पूरा करियर खत्म। पेट काट कर बेटे को कॉलेज भेजा था। पर अब डर लग रहा है। सुना है नए नियमों में हम जैसों की अब कोई सुनवाई नहीं होगी। आगे बढ़ने से पहले डिस्क्लेमर को ध्यान से पढ़ें। एक रहेंगे तो फेक रहेंगे। यह नारा आपने हजारों बार सुना होगा। सुनने में कितना अच्छा लगता है। है ना? लगता है कि हम सब एक परिवार हैं। एक देश, एक कानून, एक सुरक्षा। लेकिन क्या हो अगर मैं आपसे कहूं कि 13 जनवरी 2026 को सरकार ने यूजीसी के नए नियम जारी किए हैं। जिनमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा केवल एससी, एसटी, ओबीसी तक सीमित कर दी गई है। जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नोट यह वीडियो मेरी निजी राय और विश्लेषण पर आधारित है। मैं किसी भी जाति के खिलाफ नफरत या भेदभाव को बढ़ावा नहीं देता। मेरा मकसद केवल संविधान की भावना के तहत सभी छात्रों के लिए समान सुरक्षा की बात करना है। आज का मुद्दा किसी जाति का विरोध नहीं बल्कि उस इंसाफ की तलाश है जो संविधान ने हमें दिया है। बात हो रही है यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के उन नए नियमों की जो कहने को तो भेदभाव रोकने के लिए आए हैं लेकिन इनकी भाषा से जनरल कैटेगरी यानी सामान्य वर्ग के छात्रों को लेकर चिंता पैदा हो रही है। जरा सोचिए अगर कॉलेज में आपके बच्चे के साथ गलत हो उसके साथ मारपीट हो लेकिन नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की शिकायत केवल एससी, एसटी, ओबीसी के लिए विशिष्ट तंत्र सवर होगी तो सामान्य वर्ग के छात्रों को अन्य सामान्य कानूनी प्रावधानों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। आपको कैसा लगेगा? आज हम यूजीसी 2023 और 2026 के नियमों का वो विश्लेषण करेंगे जो मेनस्ट्रीम मीडिया में कम चर्चा में है। आज हम बात करेंगे उस चिंता की जो अब हर सामान्य वर्ग के माता-पिता के मन में है। यह वीडियो थोड़ा लंबा है क्योंकि हम हवा में बात नहीं करेंगे। हम सबूत, क्लॉज़ और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के साथ बात करेंगे। इसलिए अगर आप एक छात्र हैं, अभिभावक हैं या वो भारतीय हैं जो सच में समानता यानी इक्वलिटी में विश्वास रखते हैं तो इस बात को अंत तक सुनिएगा। चलिए अब समझते हैं कि आखिर 13 जनवरी 2026 को हुआ क्या? इस पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। साल 2023 में यूजीसी ने जो गाइडलाइंस जारी की थी उनकी भाषा बहुत साफ थी। उसमें एक शब्द था एनी कास्ट यानी कोई भी जाति। इसका मतलब था कि कॉलेज कैंपस में अगर किसी के भी साथी चाहे वो दलित हो, आदिवासी हो, ओबीसी हो या फिर ब्राह्मण ठाकुर या बनिया हो अगर उसे उसकी जाति या पृष्ठभूमि के आधार पर प्रताड़ित यानी हरास किया जाता है तो कानून उसके साथ खड़ा था। ये थी असली समानता। ये था सबका। लेकिन 2026 में जो नया ड्राफ्ट आया उसमें एक बदलाव किया गया। यूजीसी 2026 के नियमों में क्लॉज़ तीन के मुताबिक जातिगत भेदभाव की विशिष्ट शिकायत व्यवस्था केवल एससी, एसटी या ओबीसी वर्ग के लिए है। इसका मतलब समझिए अगर कल तो किसी कॉलेज में एक जनरल कैटेगरी के छात्र को मान लीजिए कोई गरीब सवर्ण छात्र है। उसे 10 लोग ढेर के मारते हैं, गालियां देते हैं उसकी जाति को लेकर। तो नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की विशिष्ट शिकायत केवल एससी, एसटी, ओबीसी के लिए है। सामान्य वर्ग को अन्य कानूनी प्रावधानों जैसे एंटी रैगिंग या आईपीसी का सहारा लेना पड़ सकता है। सरकार का तर्क है कि वंचित वर्गों को सुरक्षा की ज्यादा जरूरत है। बिल्कुल सही हम भी मानते हैं। ऐतिहासिक रूप से उनके साथ गलत हुआ है। इसे कोई नहीं नकार सकता। सरकार के आपके मुताबिक एससी, एसटी, ओबीसी के खिलाफ ऐसे मामलों में 118% वृद्धि हुई है। इसमें सख्त कदम जरूरी है। लेकिन सुरक्षा यानी सेफ्टी और आरक्षण यानी रिजर्वेशन में फर्क होता है। आरक्षण अवसर के लिए है ताकि बराबरी आए। लेकिन जीवन की सुरक्षा हर इंसान का मौलिक अधिकार है। सुरक्षा सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। अब बात करते हैं दूसरे सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जिसे हम कह सकते हैं त्वरित कार्रवाई का प्रावधान। साल 2012 और 2023 के नियमों में एक सुरक्षा चक्र था जांच यानी इन्वेस्टिगेशन। यानी आरोप लगने पर पहले देखा जाएगा कि सच्चाई क्या है। लेकिन 2026 के नियमों में मैंडेटरी कंप्लायंस और स्ट्रिक्ट एक्शन की बात कही गई है। इसका मतलब है कि कॉलेजों पर तुरंत कारवाई का दबाव है। सरकार ने कॉलेज प्रशासन पर दबाव डाला है कि अगर शिकायत आई और उन्होंने तुरंत एक्शन नहीं लिया तो कॉलेज की मान्यता यानी एफिलिएशन रद्द हो सकती है। फंड रुक सकता है। अब आप ही बताइए जब किसी कॉलेज डीन की गर्दन पर तलवार लटकी होगी तो वो क्या करेगा? क्या वो सच्चाई तलाशेगा या वो अपनी कुर्सी बचाने के लिए तुरंत उस आरोपी छात्र को सस्पेंड कर देगा। चाहे वह निर्दोष ही क्यों ना हो। यह नियम दुरुपयोग की आशंका पैदा कर रखते [हंसी] हैं। कॉलेज के चुनाव में किसी को हराना हो या टॉपर स्टूडेंट्स के बीच की प्रतिस्पर्धा में किसी को रास्ते से हटाना तो बस एक शिकायत काफी होगी। सबूत की जरूरत नहीं बस महसूस यानी पर्सव्ड होना काफी है। क्या हम अपने कॉलेजों को शिक्षा के मंदिर से बदलकर कानूनी युद्ध का मैदान नहीं बना रहे? जो लोग कह रहे हैं कि अरे अगर आपने कुछ किया नहीं तो डरना। क्यों? उन्हें मैं एक कहानी याद दिलाना चाहता हूं। यह कहानी है ललितपुर के विष्णु तिवारी की। विष्णु तिवारी पर एक झूठा केस लगा। एससी एसटी एक्ट और रेप का। उनके पास अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए ना पैसे थे, ना संसाधन। सिस्टम ने मान लिया कि शिकायत है तो सच ही होगी। परिणाम विष्णु तिवारी ने अपनी जवानी के 20 साल। जी हां, 20 साल जेल की काल कोठरी में बिता दिए। जब वह जेल गए तो जवान थे। जब 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें निर्दोष बताकर रिहा किया तब तक क्या बचा था? उनके माता-पिता मर चुके थे। उनके भाई गुजर चुके थे। उनका पुश्तैनी घर खंडहर बन चुका था। उनकी शादी कभी हो नहीं पाई। कोर्ट ने कहा सॉरी। आप निर्दोष हैं। लेकिन वो 20 साल कौन लौटाएगा? वो जवानी वो परिवार का प्यार कौन वापस करेगा? अब जरा सोचिए। यूजीसी 2026 के ये नए नियम जो त्वरित कारवाई का दबाव बनाते हैं। क्या यह हमारे कैंपस में ब्रोकर आशंका नहीं बढ़ाते? यह सवाल महत्वपूर्ण है और इसे दोनों पक्षों को मिलकर विचार करना चाहिए। भारतीय संविधान का आर्टिकल 14 क्या कहता है कि क्वालिटी बिफोर लॉ यानी कानून के समक्ष समानता। सुप्रीम कोर्ट ने अनीश कुमार बनाम बिहार राज्य केस में साफ कहा था कि गिरफ्तारी और सख्त कारवाई का अधिकार अख्तर प्रताड़ना का हथियार बन जाता है। तो फिर यूजीसी के यह नियम सुप्रीम कोर्ट की उस भावना के साथ कैसे संतुलित किए जाए यह विचार करने की जरूरत है। समाज में एक तर्क दिया जाता है। सवर्णों के पूर्वजों ने बहुत अत्याचार किए हैं। मान लेते हैं। इतिहास कड़वा है। लेकिन आज 2026 में स्कूल जाने वाले उस 18 साल के बच्चे की क्या गलती है? क्या उसे अपने परदादा के कामों की सजा मिलनी चाहिए? अगर यही न्याय है तो क्या हमें आज के अंग्रेजों के बच्चों से नफरत करनी चाहिए? क्योंकि 1947 से पहले उन्होंने हमें गुलाम बनाया। क्या हमें मुगलों के वंशजों से बदला लेना चाहिए? नहीं। एक सभ्य समाज कलेक्टिव गिल्ट यानी सामूहिक अपराध बोध पर नहीं चलता। न्याय का मतलब वह है जिसने गलती की उसे सजा मिली। नाउ पूरे वंश पूरा जाति को हमेशा के लिए अपराधी मान लिया था। तो अब सवाल है कि किया क्या जाए? हम केवल समस्या नहीं गिनाएंगे। समाधान भी देंगे। मोदी सरकार से और शिक्षा मंत्रालय से हमारी सीधी अप है। पहला रीइट्रोड्यूस एनी कास्ट। नियमों में वापस एनी कास्ट जोड़ा जाए। भेदभाव भेदभाव होता है। चाहे वो किसी के भी साथ हो। सुरक्षा हर छात्र का हक है। दूसरा मैंडेटरी एफिडेविट। हर शिकायत के साथ एक कानूनी शपथ पत्र हो। अगर जांच में शिकायत झूठी और दुर्भावनापूर्ण निकली तो शिकायतकर्ता पर भी सख्त कारवाई हो। इससे झूठे केसेस का डर खत्म होगा। तीसरा 72 आर प्रिलिमिनरी प्रोब। किसी भी छात्र को सस्पेंड कर लें या कॉलेज से निकालने से पहले कम से कम 72 घंटे यानी 3 दिन की शुरुआती जांच हो। आरोप बराबर सजा वाला सिस्टम बंद होना चाहिए। दोस्तों ये लड़ाई किसी को हराने की नहीं बल्कि देश को मजबूत बनाने की है। सरकार वन नेशन की बाह करती है। कानून में सभी नागरिकों के लिए समान सुरक्षा होनी चाहिए। एक जनरल कैटेगरी का छात्र जो पढ़ाई में अच्छा है जो देश के लिए कुछ करना चाहता है। वो कोई विशेष महल नहीं मांग रहा। वो बस इतना मांग रहा है कि मुझे सिर्फ मेरी जाति के कारण कमजोर मत समझ लो। [संगीत] मुझे मेरी बात रखने का मौका दो। अगर मेधावी छात्रों को लगेगा कि भारत के कानून में उनके लिए जगह नहीं है तो वो क्या करेंगे? वो विदेश चले जाएंगे। और यह ब्रेन ड्रेन भारत को खोखला कर देगा। नुकसान किसका होगा? हमारे ही देश का। आज जरूरत है कि हम इस बात को नीति निर्माताओं तक पहुंचाएं। सबका साथ, सबका विकास। यह सिर्फ वोटिंग पार्ट नहीं हकीकत में दिखना चाहिए। आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि सभी छात्रों के लिए समान सुरक्षा होनी चाहिए?

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