इस तकनीक के माध्यम से आएगा दिव्यांगों की जीवन क्रांतिकारी परिवर्तन।

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : ब्लाइंड मानव को  नियंत्रण देना है। हम उन्हें इंडिपेंडेंट बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि एक दिन हमारे डिवाइस के जरिए ऐसे लोग फोटोग्राफी जैसी अपनी क्रिएटिविटी भी दिखा सके। हमारा मानना ​​है कि इस तकनीक में कई सारे न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का इलाज करने की क्षमता है।क्या इसे लगाना सेफ होगा? चिप इम्प्लांट करने में हमेशा जनरल एनेस्थेसिया से जुड़ा रिस्क होता है। ऐसे में प्रोसेस टाइम को कम करके रिस्क कम किया जा सकता है। कंपनी ने इसके लिए न्यूरोसर्जिकल रोबोट डिजाइन किया है, ताकि यह बेहतर तरीके से इलेक्ट्रोड को इम्प्लांट कर सकें। इसके अलावा, रोबोट को स्कल (खोपड़ी) में 25 मिमी डायामीटर के एक छेद के जरिए थ्रेड डालने के लिए डिजाइन किया गया है। ब्रेन में एक डिवाइस डालने से ब्लीडिंग का भी रिस्क है। कंपनी इसे कम करने के लिए माइक्रो-स्केल थ्रेड्स का उपयोग कर रही है। ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस का इस्तेमाल एलन मस्क जिस टेक्नोलॉजी के जरिए चिप बना रहे हैं उसे ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस या शॉर्ट में BCIs कहा जाता है। इस पर कई और कंपनियां भी सालों से काम कर रही है। ये सिस्टम ब्रेन में रखे गए छोटे इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल पास के न्यूरॉन्स से संकेतों को “पढ़ने” के लिए करते हैं। इसके बाद सॉफ्टवेयर इन सिगनल्स को कमांड या एक्शन में डिकोड करता है, जैसे की कर्सर या रोबोटिक आर्म को हिलाना।

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