सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : भारत सरकार द्वारा बीपीएल (BPL) परिवारों की पहचान के लिए एनएसओ (NSO) द्वारा एक विशेष सर्वेक्षण (सर्वे) किया जाता है। इस प्रक्रिया में सर्वेक्षणकर्ता घर-घर जाकर परिवार के उपभोग के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। इस दौरान परिवार से उनके मासिक खान-पान, जैसे चावल और आटा की खपत से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। प्राप्त उत्तरों को वस्तुओं के औसत बाजार मूल्य के आधार पर नकद राशि में परिवर्तित कर दिया जाता है। यदि किसी परिवार का कुल मासिक व्यय निर्धारित गरीबी रेखा (जैसे ₹1800 प्रति व्यक्ति प्रति माह के मानक के अनुसार 5 सदस्यों के परिवार के लिए ₹21600 से कम पाया जाता है, तो उस परिवार को ‘निर्धनता रेखा के नीचे’ माना जाता है और उन्हें BPL राशन कार्ड प्रदान किया जाता है दिव्यांगों का मासिक आय सिर्फ सामाजिक सुरक्षा पेंशन है जो 1100 राशि से बिहार में दी जाती है और 12 माह की राशि अगर राशि को हिसाब लगाएंगे 13,200 फिर भी बीपीएल श्रेणी में क्यों नहीं आता है नियमत: यह राशि बीपीएल के लिए निर्धारित न्यूनतम सीमा से बहुत कम है। बावजूद इसके, कई दिव्यांग परिवार आज भी बीपीएल कार्ड और उससे जुड़ी योजनाओं (जैसे मुफ्त राशन और स्वास्थ्य लाभ) से वंचित हैं। NSO द्वारा किए जाने वाले उपभोग सर्वे में इन दिव्यांगों की बुनियादी जरूरतों और नगण्य आय को सही ढंग से क्यों नहीं आंका जा रहा? क्या ₹1100 की पेंशन ही उनकी उन्नति का पैमाना बन गई है या सरकारी फाइलों में गरीबी की परिभाषा बदल गई है ? “विडंबना देखिए, ₹1100 की पेंशन देने वाली सरकार मानती है कि यह मदद है, लेकिन वही सरकार ₹13,200 की वार्षिक आय को ‘गरीबी’ मानने को तैयार नहीं। आंकड़ों की इस बाजीगरी में दिव्यांगों का निवाला छीना जा रहा है।”कागजी पेट”(जब सरकारी फाइलों में पेट भरा हुआ दिखे पर हकीकत में इंसान भूखा हो)”सांख्यिकीय क्रूरता” (आंकड़ों के खेल में गरीब को बाहर रखना)“मजाक”(₹1100 की पेंशन को बीपीएल का आधार न मानना एक मजाक है)“अदृश्य निर्धन” (वे लोग जो गरीब तो हैं, पर सरकारी लिस्ट में नहीं)“सिस्टम का अंधापन” (दिव्यांगों की बेबसी न देख पाने वाला प्रशासन) बिहार की कड़वी सच्चाई यह है कि यहाँ के दिव्यांगों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन मात्र ₹1100 है। पूरे साल का हिसाब जोड़ें तो यह राशि महज ₹13,200 बैठती है। अब सवाल यह है कि जब यह राशि सरकार के ही तय मानक ₹21,600 से लगभग 40% कम है, तो इन दिव्यांगों को ‘बीपीएल’ श्रेणी में प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही? क्या कागजों पर उन्हें ‘अमीर’ मान लिया गया है या व्यवस्था अपनी आँखें मूंद चुकी है?
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