सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांगों के लिए बिल्कुल निःशुल्क काम करने वाले तोशियास सचिव ने बताया कि बिहार ग्रामीण जीविका प्रोत्साहन समिति (जीविका) की हालिया बहाली प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विज्ञापन में रिक्तियां होने के बावजूद, अंतिम परिणाम में ‘क्षेत्र समन्वयक’ पद के लिए ‘सामान्य अस्थि दिव्यांग’ श्रेणी का चयन-प्राप्तांक जारी नहीं करना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अभ्यर्थियों ने साक्ष्यों के साथ आरोप लगाया है कि जब विज्ञापन में क्षेत्र समन्वयक के लिए दिव्यांगों की सीटें आरक्षित थीं, तो परिणाम की तालिका से इस श्रेणी का चयन-प्राप्तांक क्यों गायब है? पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग श्रेणियों के दिव्यांगों का विवरण तो दिया गया, लेकिन सामान्य श्रेणी के दिव्यांगों को अंधेरे में रखा गया। क्या विभाग ने इन सीटों को पर्दे के पीछे से भरने की कोशिश की है? पारदर्शिता का यह अभाव भ्रष्टाचार की आशंका को जन्म दे रहा है। सैकड़ों अभ्यर्थियों के सूचना-पटल पर “अर्हता प्राप्त, किंतु आगे रिक्ति न होने के कारण चयनित नहीं” का संदेश चमक रहा है। यह विभाग की वह ‘छिपाव’ तकनीक है, जिसका अर्थ है कि आपने परीक्षा तो उत्तीर्ण की, लेकिन विभाग के पास आपके लिए सीटें नहीं हैं। सवाल यह है कि यदि सीटें भरी जा चुकी थीं, तो किस आधार पर? जब चयन-प्राप्तांक ही सार्वजनिक नहीं किया गया, तो अभ्यर्थी कैसे मान ले कि चयन निष्पक्ष हुआ है? हैरानी की बात यह है कि ‘सामुदायिक समन्वयक’ के परिणाम में विभाग ने सामान्य अस्थि दिव्यांग का चयन-प्राप्तांक (51.72) घोषित किया है, लेकिन ‘क्षेत्र समन्वयक’ में इसे पूरी तरह छिपा लिया गया। यह दोहरा मापदंड विभाग की मंशा पर संदेह पैदा करता है। अभ्यर्थियों का कहना है कि यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि योग्य दिव्यांगों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। आक्रोशित दिव्यांग अभ्यर्थियों ने चेतावनी दी है कि यदि विभाग ने प्रत्येक पद के लिए श्रेणी-वार योग्यता सूची और चयन-प्राप्तांक अंक स्पष्ट नहीं किए, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगे। मुख्य सवाल यह है कि क्षेत्र समन्वयक की सामान्य अस्थि दिव्यांग सीटें आखिर किसके अंकों पर भरी गईं? बिना चयन-प्राप्तांक जारी किए ‘रिक्ति पूर्ण’ का बहाना क्यों? क्या दिव्यांगों के क्षैतिज आरक्षण के नियमों का उल्लंघन हुआ है?
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