सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक के अनुसार प्रति 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। हालांकि, भारत आंकड़ों में इस मानक को पूरा करने का दावा करता है, लेकिन वास्तविक धरातल पर स्थिति काफी भिन्न है यह बहुत बड़ा झूठ बोला जाता है ऐसा कोई बात विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्कुलर में नहीं लिखा हुआ है डॉक्टरों का पलायन (Brain Drain) OECD की रिपोर्ट के अनुसार, भारत विदेशों में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भेजने वाला सबसे बड़ा देश है भारत में मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई योग्य डॉक्टर बेहतर अवसरों, वेतन और कार्य परिस्थितियों के लिए विदेश चले जाते हैं 3. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) की स्थिति देश में ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में डॉक्टरों और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है (लगभग 25,000+ PHC बिना पर्याप्त डॉक्टरों के चल रहे हैं) 4. मेडिकल कॉलेजों और सीटों की वृद्धि का वास्तविकता से अंतर सरकार द्वारा नए मेडिकल कॉलेज खोलने और MBBS सीटों की संख्या बढ़ाने के दावों के बावजूद, ग्रामीण और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में योग्य डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित नहीं हो पा रही है 5. नीतिगत खामियां और समाधान की आवश्यकता केवल आंकड़े दिखाने या मेडिकल कॉलेज खोलने से समस्या का हल नहीं होगा “दिव्यांग” शब्द सम्मान का प्रतीक माना गया। उद्देश्य था कि समाज विकलांगता को हीनता नहीं, बल्कि गरिमा और अधिकारों के दृष्टिकोण से देखे। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल शब्द बदल देने से वास्तविकता बदल जाती है ? जब अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बिना विशेषज्ञों के चल रहे हों, गाँवों में इलाज के लिए लोगों को दर्जनों किलोमीटर भटकना पड़े, योग्य डॉक्टर बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाएँ और स्वास्थ्य व्यवस्था आँकड़ों के सहारे अपनी सफलता का दावा करती रहे, तब “दिव्यांग” शब्द का सम्मान भी अधूरा दिखाई देता है कड़वा सच यह है कि किसी नागरिक को “दिव्यांग” कहकर सम्मान देना आसान है, लेकिन उसे संविधान और कानून के अनुरूप समान अवसर देना कठिन साबित हो रहा है। शब्दों की राजनीति तब खोखली लगती है, जब अधिकार कागज़ों में और सुविधाएँ घोषणाओं में कैद रह जाएँ देश को केवल नए नाम नहीं, नई नीतियाँ चाहिए। केवल नए मेडिकल कॉलेज नहीं, ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टर चाहिए। केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, उनका धरातल पर क्रियान्वयन चाहिए। केवल सम्मानजनक संबोधन नहीं, सम्मानजनक जीवन चाहिए “दिव्यांग” कोई चिकित्सकीय या कानूनी परिभाषा नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदनशीलता की भाषा है। यह शब्द व्यक्ति की पहचान उसकी कमी से नहीं, बल्कि उसके आत्मसम्मान, क्षमता और मानवीय गरिमा से जोड़ने का प्रयास करता है दिव्यांग कहा जाता है—मानो उनके भीतर कोई दिव्य शक्ति हो। लेकिन समाज का व्यवहार अक्सर यह कहता है कि “तुम्हारे लिए रास्ते नहीं हैं, अधिकार नहीं हैं, सुविधाएँ नहीं हैं, और इंतज़ार ही तुम्हारी नियति है।”
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