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दिव्यांग आरक्षण नियम क्या है ?

सर्वप्रथम न्यूज सौरभ कुमार : दिव्यांग आरक्षण क्यों आया जानते हो? इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण है। सच जानना है तो मेरी बात सुनो। आरक्षण किसी पर अहसान नहीं है। यह उन लोगों को अवसर देने का माध्यम है जिन्हें लंबे समय तक अवसरों से दूर रखा गया। सच्ची मंजिल बराबरी है। जिस समाज में सदियों तक भेदभाव रहा हो, वहां सिर्फ कानून में बराबरी लिख देना काफी नहीं, जरूरत है कि कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने मिले। इसी सोच से विशेष प्रतिनिधित्व की व्यवस्था सामने आई। आरक्षण का उद्देश्य किसी दूसरे का अधिकार छीनना नहीं है, इसका उद्देश्य वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाना है ताकि लोकतंत्र में हर वर्ग की आवाज दिखाई दे। शिक्षा और रोजगार में अवसर मिलेंगे तभी समाज आगे बढ़ेगा। जो लोग लंबे समय तक पीछे रखे गए, उन्हें आगे आने का रास्ता मिलना चाहिए; यही सामाजिक न्याय की दिशा है। मेरा लक्ष्य केवल आरक्षण देना नहीं, बल्कि समानता वाला समाज बनाना है। जिस दिन हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के समान अवसर मिलेगा, उस दिन ऐसी विशेष व्यवस्था की जरूरत भी कम हो जाएगी क्या डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण की शुरुआत भारत में की? यह सवाल बड़ा मजेदार इसलिए है क्योंकि अंबेडकर जी को गाली देने वाले और अंबेडकर जी के लिए ताली बजाने वाले, दोनों यहाँ पर एक साथ गलत होते हैं। एक तरफ भारत में वे लोग हैं जो तारीफ में कहते हैं कि बाबा साहब की वजह से आरक्षण मिला, दूसरी तरफ वे लोग हैं जो इस ताने में कहते हैं कि आरक्षण को लेकर जितना विवाद है वह डॉक्टर अंबेडकर की वजह से है। लेकिन सच क्या है? सच दोनों के बीच में है। तथ्य (फ़ैक्ट) बताते हैं आपको। भारत में जब पहली बार आरक्षण लागू हुआ, अंबेडकर जी उस वक्त 12 साल के भी नहीं थे। तारीख थी 26 जुलाई साल 1902, जगह थी कोल्हापुर रियासत। शाहू महाराज ने गजट में एक आदेश निकलवाया जिसमें साफ लिखा था कि इस आदेश की तारीख से जो भी पद खाली होंगे, उनमें 50% पिछड़े वर्गों से भरा जाएगा और जिन दफ्तरों में इनकी संख्या 50% से कम है, वहां पर आगे जितनी भी पोस्टिंग होगी, वह इन्हीं से होगी। इतना ही नहीं, हर विभाग के मुखिया को भी 3-3 महीने पर रिपोर्ट भेजने का आदेश था, यानी सिर्फ ऐलान नहीं था, निगरानी का इंतजाम भी किया गया था। यह आदेश आज भी दस्तावेजों में मौजूद है और इसे भारत में आरक्षण का पहला सरकारी आदेश माना जाता है। इसके बाद मैसूर की बारी आती है जहाँ पर महाराजा नालवाड़ी कृष्णराज वोडेयार ने साल 1918 में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण की सिफारिश करने की कमेटी बिठाई। दिलचस्प बात यह है कि उसी वक्त कमेटी बैठते ही उनके खुद के दीवान एम. विश्वेश्वरैया ने इसका विरोध करके इस्तीफा दे दिया, लेकिन कमेटी की सिफारिशें साल 1921 में लागू हो गईं। उसी साल 16 सितंबर 1921 को मद्रास प्रेसिडेंसी में जस्टिस पार्टी की सरकार पहला कम्युनल गवर्नमेंट ऑर्डर लेकर आती है, जिसमें सरकारी नौकरियों का बंटवारा समुदायों के हिसाब से तय किया गया। यह सारा कुछ अंबेडकर साहब के सार्वजनिक जीवन में उतरने से पहले की बात है। सवाल फिर अंबेडकर साहब ने किया क्या? तो अंबेडकर साहब ने वह किया जो इन सबसे बड़ा था। अंबेडकर ने इसे मेहरबानी की जगह संविधान में बदल दिया, जहाँ इसे छूने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। उन्होंने आरक्षण शुरू नहीं किया, उन्होंने उसे अहसान से हक में बदल दिया और ये दोनों चीजें बहुत अलग हैं। और चलते-चलते एक इत्तेफाक आपको और बताते हैं, मजेदार है। जिन शाहू महाराज ने साल 1902 में वह आदेश निकाला था आरक्षण का, उन्हीं शाहू महाराज ने 1920 में उस नौजवान भीमराव की जेब में पैसे डाले थे जब वह अपना पहला अखबार ‘मूकनायक’ खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे। अब आप खुद बताइए, इस देश में आरक्षण का जनक किसे कहेंगे? उस राजा को जिसने पहला आदेश निकाला, अंबेडकर जी के अखबार के समय में उन्हें पैसे दिए, या उन अंबेडकर जी को जिन्होंने उसे कागज से उठाकर हमेशा के लिए कानून बना दिया? फैसला आप पर छोड़ते हैं आरक्षण वाले कैंडिडेट का नंबर अगर जनरल वालों के बराबर या उनसे ज्यादा भी आ जाता था, फिर भी उनको आरक्षण की श्रेणी में ही रखा जाता था। इसकी शिकायत बिहार सरकार के पास पहुंची, उसके बाद बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने निर्देश जारी किया है कि आरक्षण कैटेगरी चाहे महिला का हो, एससी (SC) का हो, एसटी (ST) का हो, बीसी (BC) का हो, ईबीसी (EBC) का हो या ईडब्ल्यूएस (EWS) का हो, दिव्यांग का हो, किसी भी आरक्षण कैटेगरी वाले कैंडिडेट का नंबर अगर जनरल वालों के बराबर हो या उनसे ज्यादा हो, तो उनका सेलेक्शन जनरल में किया जाए ना कि रिजर्व्ड कैटेगरी में किया जाए। बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने यह निर्देश जारी किया है, जो कि स्वागत योग्य कदम है बिहार सरकार का।

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