दिव्यांगजनों के लिए कौन से कानून हैं ? यूनिक आईडी की अस्तित्व की लड़ाई।

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : सरकार के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग द्वारा 25 अगस्त 2026 को जारी और 2 सितंबर 2026 को यूडीआईडी श्रेणी में उपलब्ध कराए गए मूल दस्तावेज के अनुसार वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक यूडीआईडी योजना पर कुल ₹83.50 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव है, जिसके प्रावधान 1 सितंबर 2026 से प्रभावी किए गए हैं और लक्ष्य सभी पात्र बेंचमार्क दिव्यांगजनों तक दिव्यांगता प्रमाण-पत्र एवं यूडीआईडी कार्ड पहुँचाना है; दस्तावेज के अनुसार 2011 की जनगणना में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन और केवल सात दिव्यांगता श्रेणियाँ दर्ज थीं, जबकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के बाद मान्य दिव्यांगताओं की संख्या 21 हो गई और वर्तमान 21 श्रेणियों के दिव्यांगजनों की अद्यतन आधिकारिक जनसंख्या का पूर्ण आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जबकि 25 मार्च 2026 को संसद में सरकार ने देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यूडीआईडी व्यवस्था संचालित होने तथा 1,35,91,096 यूडीआईडी कार्ड/प्रमाण-पत्र तैयार होने की जानकारी दी थी; पांच वर्षों की प्रस्तावित ₹83.50 करोड़ राशि में ₹30.31 करोड़ यूडीआईडी सॉफ्टवेयर, ई-केवाईसी, राष्ट्रीय बादल सेवाओं और आधार तिजोरी आदि पर, ₹12.18 करोड़ कार्ड छपाई पर, ₹16.58 करोड़ कार्ड भेजने की व्यवस्था पर, ₹11.04 करोड़ राज्य समन्वयकों के मानदेय पर, ₹1 करोड़ विज्ञापन एवं जनजागरूकता पर, ₹9.50 करोड़ सूचना-प्रौद्योगिकी ढाँचे पर तथा ₹2.89 करोड़ प्रशासनिक खर्च पर प्रस्तावित हैं, अर्थात लगभग ₹58.07 करोड़ यानी करीब 69.5 प्रतिशत राशि सॉफ्टवेयर, कार्ड छपाई, वितरण और समन्वय जैसी व्यवस्था-आधारित मदों में प्रस्तावित है, जबकि प्रत्यक्ष जनजागरूकता के लिए केवल ₹1 करोड़ रखा गया है; यदि मार्च 2026 तक तैयार 1,35,91,096 यूडीआईडी कार्ड/प्रमाण-पत्र को केवल संदर्भ आधार मानकर ₹83.50 करोड़ की पूरी प्रस्तावित राशि से तुलना की जाए तो लगभग ₹614 प्रति मौजूदा कार्ड/प्रमाण-पत्र का संकेतक निकलता है, हालांकि इसे वास्तविक प्रति कार्ड लागत नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें पांच वर्षों का सॉफ्टवेयर विकास एवं रखरखाव, डिजिटल सुरक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी ढाँचा, राज्य समन्वय और प्रशासनिक खर्च भी शामिल हैं; इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि ₹83.50 करोड़ का प्रावधान अपने आप में भ्रष्टाचार है, बल्कि यह है कि इस राशि के प्रत्येक रुपये के बदले कितने नए पात्र दिव्यांगजनों को प्रमाण-पत्र मिला, कितने लोगों को यूडीआईडी कार्ड वास्तव में प्राप्त हुआ, आवेदन से कार्ड मिलने में कितना समय लगा, कितने आवेदन लंबित या अस्वीकृत रहे, कितने कार्ड तकनीकी समस्या या गलत पते के कारण नहीं पहुँचे, कितने कार्ड दोबारा भेजे गए, प्रत्येक राज्य को कितनी राशि मिली और उसके बदले कितने वास्तविक लाभार्थी जुड़े; विशेष रूप से ₹12.18 करोड़ की कार्ड छपाई और ₹16.58 करोड़ की वितरण राशि के लिए निविदा मूल्य, कार्डों की कुल संख्या, प्रति कार्ड छपाई लागत, प्रति कार्ड डाक खर्च, असफल वितरण और एजेंसियों को किए गए वास्तविक भुगतान सार्वजनिक किए जाने चाहिए; उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के आधार पर अभी ₹83.50 करोड़ के प्रावधान को निश्चित रूप से भ्रष्टाचार कहना प्रमाणित नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए निविदा में अनियमितता, मिलीभगत, फर्जी बिल, अधिक भुगतान, बिना सेवा भुगतान या अन्य वित्तीय अनियमितता का ठोस प्रमाण आवश्यक है, लेकिन सरकार द्वारा स्वयं वर्तमान 21 दिव्यांगता श्रेणियों की पूर्ण आधिकारिक आबादी का आंकड़ा उपलब्ध न होने की स्वीकारोक्ति और इतने बड़े व्यय के बीच यह गंभीर सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न अवश्य बनता है कि पांच वर्ष बाद सरकार केवल खर्च का हिसाब देगी या खर्च के बदले प्राप्त वास्तविक परिणाम का भी जिला-वार, राज्य-वार और श्रेणी-वार हिसाब देगी; दिव्यांगजनों के नाम पर खर्च होने वाली राशि का अंतिम परिणाम केवल सॉफ्टवेयर, बादल सेवाओं, कार्ड छपाई, डाक और प्रशासनिक व्यवस्था में दिखाई देने के बजाय दिव्यांग व्यक्ति के हाथ में प्रमाण-पत्र, उसके घर तक पहुँचा यूडीआईडी कार्ड और सरकारी अधिकारों तक आसान पहुँच के रूप में दिखाई देना चाहिए, इसलिए ₹83.50 करोड़ पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यह धन वास्तव में दिव्यांगजनों तक अधिकार पहुँचाने में कितना लगा और व्यवस्था चलाने में कितना, तथा इसका अंतिम उत्तर निविदा, भुगतान, लाभार्थी और स्वतंत्र लेखा-परीक्षण के सार्वजनिक आंकड़ों से ही सामने आ सकता है।

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