सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : भारत के दिव्यांग जो बेरोजगार है उनकी मासिक आय 11 सौ रुपए हैं जो सामाजिक सुरक्षा पेंशन के अंतर्गत लोगों को प्राप्त होता है एवं खर्च को भी समझ लीजिए क्या महंगाई सिर्फ अखबारों की खबरों तक सीमित एक आंकड़ा है, या करोड़ों बेबस परिवारों के जीवन की कड़वी सच्चाई। उनका कहना है कि महंगाई की असल वेदना केवल वही समझ सकता है जो महीने के आखिरी दिनों में खाली जेब के साथ खड़ा रहता है; जब एक मजदूर दिन भर पसीना बहाने के बाद बाजार में दाम सुनकर आधा सामान छोड़कर वापस लौटने को मजबूर होता है। चीनी,दाल, तेल, दूध, बिजली और रसोई गैस के लगातार बढ़ते दामों ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है, जबकि उनकी आय जस की तस बनी हुई है। इस विकराल स्थिति में माँ-बाप अपनी व्यक्तिगत जरूरतें त्यागकर बच्चों की पढ़ाई, इलाज और राशन की व्यवस्था करने का प्रयास करते हैं, फिर भी महीने के अंत में जेब खाली रहती है और परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। वे तीखा सवाल उठाती हैं कि क्या ऐसी स्थिति में देश को ‘विकसित’ कहा जा सकता है, जहाँ ८ से १२ हजार की मामूली कमाई में जीवन गुजारना एक दैनिक लड़ाई बन चुका हो भारत में जुलाई 2026 की अखिल भारतीय उपभोक्ता महंगाई दर 4.45% दर्ज हुई है बिहार सरकार के 2026-27 के दस्तावेज में बिहार राज्य विकलांगता सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के लिए राज्य योजना मद में ₹230 करोड़ के व्यय की स्वीकृति दर्ज है, और अगस्त 2026 में अतिरिक्त ₹793.38 करोड़ के व्यय की स्वीकृति भी दर्ज है जब महंगाई लगातार बढ़ रही है, तो दिव्यांग व्यक्ति की पेंशन भी महंगाई सूचकांक से क्यों नहीं जोड़ी जाए, ताकि उसकी वास्तविक क्रय-शक्ति सुरक्षित रह सके? यदि कीमतें औसतन 4.45% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ती रहें, तो केवल गणितीय उदाहरण के तौर पर 3 साल में कीमतों का स्तर लगभग 13.95% बढ़ सकता है 5 साल में लगभग 24.32%। 10 साल में लगभग 54.56%।इसका अर्थ है कि आज की ₹1,100 की क्रय-शक्ति को भविष्य में बनाए रखने के लिए पेंशन को समय-समय पर महंगाई के अनुसार बढ़ाना पड़ेगा।
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