दिव्यांगों के अधिकार पर बड़ा सवाल, कानून है तो न्याय कब मिलेगा?

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांग भारतीय कानून के सिद्धांत “इंजूरिया साइन डैम्नो” और “डैम्नम साइन इंजूरिया ”को दिव्यांगजन के जीवन से जोड़कर समझें तो इनका अर्थ बेहद गहरा है। “इंजूरिया साइन डैम्नो” का अर्थ है कि किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ, भले ही उसे प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान न हुआ हो, फिर भी अधिकारों का उल्लंघन अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी योग्य दिव्यांग अभ्यर्थी को केवल उसकी दिव्यांगता के कारण परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया, जबकि उसके पास सभी आवश्यक प्रमाणपत्र और पात्रता मौजूद थी। हो सकता है उस समय उसकी जेब से कोई पैसा न गया हो, लेकिन उसके समान अवसर और कानूनी अधिकार पर चोट हुई—यही “इंजूरिया साइन डैम्नो” की भावना को समझने का एक सरल उदाहरण है। वहीं “डैम्नम साइन इंजूरिया” का अर्थ है कि किसी व्यक्ति को वास्तविक नुकसान या आर्थिक हानि तो हुई, लेकिन उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ। जैसे किसी दिव्यांग व्यक्ति ने किसी रोजगार के लिए पूरी तरह वैध प्रक्रिया के तहत आवेदन किया, लेकिन निर्धारित योग्यता और चयन प्रक्रिया के आधार पर किसी दूसरे अभ्यर्थी का चयन हो गया; केवल चयन न होने से हुई निराशा या आर्थिक अवसर की कमी अपने आप में अधिकारों का उल्लंघन सिद्ध नहीं करती। इसलिए दिव्यांगजन के मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि “नुकसान कितना हुआ?”, बल्कि यह भी है कि “क्या किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, समान अवसर, सम्मान और न्यायपूर्ण व्यवहार के अधिकार का उल्लंघन हुआ?” यही वह अंतर है जो कागज पर लिखे अधिकार और जमीन पर मिले न्याय के बीच की दूरी को सामने लाता है। दिव्यांग व्यक्ति को यदि अधिकार से वंचित किया गया है, तो उसकी पीड़ा केवल इसलिए छोटी नहीं हो जाती कि उसके खाते से पैसा नहीं गया या शरीर पर कोई चोट नहीं आई। कभी-कभी अधिकार छीन लिया जाना ही सबसे बड़ी चोट होती है।

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