सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : यह बिल्कुल सही विश्लेषण है कि कई बार उत्पाद की शुरुआती कीमत (Initial Cost) सिर्फ एक चारा होती है, जबकि असली खेल “रखरखाव के खर्च” (Maintenance Cost) में छिपा होता है। अर्थशास्त्र में इसे प्रायः ‘रेजर-एंड-ब्लेड’ मॉडल कहा जाता है, जहाँ मुख्य मशीन सस्ती दी जाती है ताकि आप उसके महंगे स्पेयर पार्ट्स बार-बार खरीदने को मजबूर हों। जहां तक सरकार द्वारा दिव्यांगजनों को दी जाने वाली मोटर चालित ट्राइसाइकिल (Battery Operated Tricycle) की बात है, तो यह स्थिति वहां और भी गंभीर हो जाती है मुफ्त का उपहार या भविष्य का आर्थिक बोझ ? सरकार जब किसी दिव्यांग व्यक्ति को निशुल्क मोटर चालित साइकिल देती है, तो वह पल लाभार्थी के लिए बड़ी राहत और आजादी जैसा लगता है। लेकिन असली चुनौती तब शुरू होती है जब एक साल बाद उसकी वारंटी खत्म होती है। इन साइकिलों में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसकी लीथियम-आयन या लीड-एसिड बैटरी होती है, जिसकी औसत उम्र 1.5 से 2 साल होती है। जब बैटरी खराब होती है, तो उसे बदलने का खर्च ₹10,000 से ₹15,000 तक आता है। इसके अलावा, मोटर, कंट्रोलर और टायर जैसे पार्ट्स भी सामान्य साइकिल की तुलना में बहुत महंगे होते हैं। एक दिहाड़ी मजदूर या सीमित आय वाले दिव्यांग व्यक्ति के लिए, जिसे वह वाहन ‘फ्री’ मिला था, अचानक इतनी बड़ी रकम जुटा पाना नामुमकिन हो जाता है। नतीजा यह होता है कि वह कीमती सरकारी संपत्ति घर के कोने में कबाड़ बनकर खड़ी रह जाती है। कंपनियों के लिए यह एक बड़ा बाजार है क्योंकि वे जानती हैं कि सरकार एक बार भुगतान करेगी, लेकिन उसके बाद का सारा स्पेयर पार्ट और सर्विसिंग का मुनाफा सीधे दिव्यांग व्यक्ति की जेब से आएगा। इस प्रकार, जो साधन आत्मनिर्भरता के लिए दिया गया था, वह सही सर्विसिंग नीति के अभाव में अक्सर एक सफेद हाथी साबित होता है, जिसकी कमाई का जरिया अंततः वह कंपनी ही बनती है जो उसके पार्ट्स बेचती है।
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