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​”दिव्यांगों का ’30 साल का वनवास’ कब होगा खत्म? बुनियादी केंद्रों पर सरकारी उदासीनता की मार।”

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : एक तरफ जहां सरकार ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016’ (RPWD Act 2016) का हवाला देकर दावा करती है कि दिव्यांगों को अब सरकारी दफ्तरों और अस्पतालों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे और उन्हें उनके घर के पास ही ‘बुनियाद केंद्रों’ के माध्यम से तमाम सुविधाएं दी जाएंगी। वहीं दूसरी तरफ, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। दिव्यांगों के लिए नि:शुल्क काम करने वाले तोशियास सचिव ने बिहार सरकार की इस पूरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने बताया कि राज्य के बुनियाद केंद्रों और अस्पतालों में विशेषज्ञ कर्मचारी ही मौजूद नहीं हैं, जिससे दिव्यांग अपने संवैधानिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित हो रहे हैं हैरानी की बात यह है कि मूक-बधिर और श्रवण बाधित (सुनने और बोलने में असमर्थ) लोगों के इलाज के लिए वर्ष 2019 में ही बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा नियमित वेतनमान पर पदों के सृजन की स्वीकृति कैबिनेट से मिल चुकी थी। 3 दिसंबर 2019 की मंत्रिपरिषद की बैठक में अन्य विभागों की नियुक्तियां तो बिहार तकनीकी सेवा आयोग (BTSC) के माध्यम से पूरी कर ली गईं, लेकिन सदर अस्पतालों में स्पीच पैथोलॉजिस्ट-सह-ऑडियोलॉजिस्ट और ऑडियोग्राफर के स्वीकृत 72 पदों (36×2) पर आज तक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई।इसके अलावा, स्टेट सोसाइटी फॉर अल्ट्रा पुअर एंड सोशल वेलफेयर (सक्षम) के तहत वर्ल्ड बैंक परियोजना के तहत स्वीकृत जिला और अनुमंडल स्तर के कुल 1465 तकनीकी पदों (जैसे- सेंटर मैनेजर, सीनियर फिजियोथेरेपिस्ट, ऑडियोलॉजिस्ट सह स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट आदि) को नियमित आधार पर भरने की प्रक्रिया भी ठंडे बस्ते में है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में लगभग 54 लाख श्रवण बाधित और 41 लाख मूक-बधिर लोग हैं। इन 95 लाख लोगों के इलाज के लिए पूरे प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों, सदर अस्पतालों और अनुमंडलीय अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर और थेरेपिस्ट के पद सालों से रिक्त पड़े हैं। सरकारी उदासीनता का आलम यह है कि इन पीड़ितों को मजबूरन लाखों रुपये खर्च करके इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे गरीब परिवार कर्ज के दलदल में धंसते जा रहे हैं अधिनियम 2016 के तहत दिव्यांगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं स्थानीय स्तर पर मिलना उनका कानूनी अधिकार है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर स्पीच थेरेपी और ऑडिओलॉजी सपोर्ट न मिलने के कारण कई बच्चे जीवन भर के लिए मूक-बधिर रहने को अभिशप्त हो जाते हैं, जिन्हें शुरुआती इलाज से ठीक किया जा सकता था सामाजिक संगठनों और तोशियास सचिव ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि स्वीकृत सभी 1465 तकनीकी पदों और सदर अस्पतालों के 72 विशेषज्ञ पदों पर बिना किसी देरी के नियमित बहाली के लिए विज्ञापन निकाला जाए ​’बुनियाद केंद्रों’ को केवल ढांचा न बनाकर वहां तत्काल डॉक्टरों और थेरेपिस्टों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए, ताकि दिव्यांगों का यह ’30 वर्षों का वनवास’ खत्म हो सके।

 

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