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राष्ट्रीय ध्वज की निर्माण की गौरव पूर्ण कहानी जिसे पढ़कर गौरवान्वित होंगे आप

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : आज दिल्ली के लाल किले की प्राचीर पर पीएम नरेंद्र मोदी तिरंगा फहराऐ। इसके साथ ही देश के छोटे-बड़े हर संस्थान में झंडा फहराकर जन गण मन गाया जाएगा। 26 जनवरी और 15 अगस्त दो ऐसे दिन हैं जब पूरे देश में तिरंगा लहराता है। देखने से तो लगता है कि तीन रंग और अशोक चक्र से मिले इस झंडे को तो झट से कोई भी कारीगर बना सकता है। क्या यह मुमकिन है? तो जवाब है नहीं।

तिरंगे को एक स्टैंडर्डाइज्ड प्रॉसेस से बनाया जाता है। कर्नाटक के खादी डेवलपमेंट एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन (KVI) ही राष्ट्रध्वज निर्माण करने के लिए खादी की किसी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को चुनती है। साल 2004 में कमीशन ने राष्ट्रीय ध्वज निर्माण का अधिकार कर्नाटक के धारवाड़ जिले के हुबली शहर में स्थित बेंगरी गांव के कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ (KKGSS) को दिया।

देश भर के राष्ट्रध्वजों का निर्माण यहीं होता है। यहां की स्पेशल टीम ही इस तिरंगे को अंतिम रूप देती है। KKGSS की ही दूसरी यूनिट बागलकोट शहर में राष्ट्रध्वज के लिए सूत कातने और कपड़ा बुनकर बेंगरी भेजती है। यानी खादी ग्रामोद्योग की केवल इन्हीं दो यूनिटों की मशक्कत से पूरे देश के लिए तिरंगा बनकर तैयार होता है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने 2004 में इस संस्था को तिरंगा बनाने का सर्टिफिकेशन दिया था।

संस्थान के जनरल सेक्रेटरी शिवानंद कहते हैं, तिरंगे को बनाना बच्चों का खेल नहीं। इसे बनाने के लिए धैर्य, सावधानी, बारीकी और समर्पण चाहिए। हमारे संस्थान में औरतों की एक एक्सपर्ट टीम है जो इस तिरंगे को बनाने का काम करती है। कोशिश रहती है कि यह टीम पूरे साल बस तिरंगे का ही निर्माण करे। ताकि तय मानकों से समझौते की गुंजाइश न रहे। शिवानंद कहते हैं ‘तिरंगा बनाना आर्ट है, लेकिन साथ ही यह साइंस भी है। 18 तरह की लैब टेस्टिंग के बाद झंडा बनकर तैयार होता है।

तिरंगे की निर्माण इकाई की टीम में औरतों का बोलबाला
शिवानंद कहते हैं कि हर स्तर पर तकरीबन 70-80 लोगों की टीम है। पुरुषों की संख्या 5-10 के बीच में ही होती है। फाइनल टच देने में तो एक भी पुरुष फिलहाल टीम में नहीं है। ध्वज बनाने की टीम की प्रमुख अन्नपूर्णा कहती हैं, ‘2005-06 से मैं यहां पर हूं। पुरुष टीम में काम करते हैं, लेकिन बहुत कम संख्या में। वे सहायक की भूमिका में ही रहते हैं। हर स्तर पर लीड औरतें ही करती हैं। मेरा अनुभव कहता है कि औरतें मानक से समझौता नहीं करतीं। 18 लैब टेस्ट जैसी अग्निपरीक्षा से गुजरने में भी अपना धैर्य बनाए रखती हैं, लेकिन पुरुषों में झल्लाहट दिख जाती है।’

क्या होता है लैब टेस्टिंग में ?
शिवानंद कहते हैं, ‘झंडे को बनाने में चार रंगों का इस्तेमाल होता है। लिहाजा इन सभी रंगों की लैब टेस्टिंग होती है। अगर मानक से जरा भी नीचे रंग पाए जाते हैं तो फिर दोबारा रंगने की प्रक्रिया की जाती है। इसीलिए तिरंगे को बनाना आसान नहीं। उसके रंग से लेकर आकार तक सब तय है। इसमें जरा सी भी ऊंच-नीच नहीं हो सकती।

दो हिस्सों में तैयार होता है तिरंगा
कर्नाटक के बागलकोट शहर में स्थित खादी ग्रामोद्योग की यूनिट तिरंगे के लिए सूत कातने और कपड़ा बुनने का काम करती है। यहां एक टीम है जो तिरंगे के लिए सूत काटने से लेकर कपड़े को बुनने तक का काम करती है। फिर यह कपड़ा कर्नाटक के बेंगरी की यूनिट में पहुंचता है। जहां इसे तीन प्लॉट में काटकर अलग-अलग तीन रंग किए जाते हैं। फिर इस पर अशोक चक्र बनाया जाता है और इसे अंतिम रूप दिया जाता है।

एक साल में तकरीबन साढ़े तीन करोड़ ध्वजों की होती है सप्लाई
एक साल में तकरीबन साढ़े तीन करोड़ झंडों की सप्लाई पूरे देश में अलग-अलग अवसरों पर होती है। 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा पूरे साल सरकारी महोत्सवों, दफ्तरों, स्कूलों में लगातार झंडे सप्लाई किए जाते हैं।अन्नपूर्णा कहती हैं, मुझे पूरा आंकड़ा तो नहीं पता, लेकिन कोरोना की वजह से मौजूदा साल में ध्वज की सप्लाई हर साल के मुकाबले करीब आधी ही हुई। शिवानंद भी उनकी बात से इत्तेफाक रखते हैं। वे कहते हैं, ‘तकरीबन डेढ़ करोड़ ही राष्ट्रध्वज की सप्लाई महामारी के साल में हुई।’

 

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