सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांगों के लिए बिल्कुल निःशुल्क काम करने वाले तोशियास सचिव ने बताया कि एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में दिव्यांग व्यक्ति के जीवन जीने का खर्च कहीं अधिक होता है। उन्हें सहायक उपकरणों (जैसे व्हीलचेयर, प्रोस्थेटिक्स), नियमित फिजियोथेरेपी, विशेष चिकित्सा देखभाल और सहायक (Caregiver) की आवश्यकता होती है। यदि उनकी पारिवारिक आय APL श्रेणी में आती भी है, तो इस ‘अतिरिक्त खर्च’ के कारण उनकी वास्तविक क्रय शक्ति (Purchasing Power) बीपीएल परिवारों से भी कम हो जाती है।राशन कार्ड का निर्धारण अक्सर परिवार की कुल आय या जमीन के आधार पर होता है। लेकिन तर्क यह है कि कई विकसित देशों में दिव्यांगता को ‘सामाजिक असुरक्षा’ का आधार माना जाता है, न कि केवल आय को। भारत में भी अंत्योदय (AAY) या प्राथमिकता वाले परिवारों (PHH) की सूची में दिव्यांगों को बिना किसी आय सीमा के शामिल करने की आवश्यकता है सफेद राशन कार्ड मिलने का मतलब है कि व्यक्ति को सरकार की अधिकांश सब्सिडी वाली योजनाओं (सस्ता अनाज, स्वास्थ्य योजनाएं आदि) से बाहर कर दिया गया है। यह दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय उन्हें हाशिए पर धकेलने जैसा है।दिव्यांग समाज को केवल ‘सफेद कार्ड’ देना उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं की अनदेखी करना है। नीतिगत स्तर पर सुधार की आवश्यकता है ताकि दिव्यांगता की गंभीरता और उसके आर्थिक बोझ को समझते हुए उन्हें अंत्योदय या बीपीएल श्रेणी के लाभ सुनिश्चित किए जा सकें। अमर्त्य सेन का कहना था गरीबी क्षमताओं का अभाव है। अर्थात व्यक्ति में क्षमता नहीं है, किस चीज़ की क्षमता कि वो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। उसके पास क्षमता नहीं है इसीलिए वह गरीब है, इसीलिए वह निर्धनता में जीवन यापन कर रहा है। फिर जैसे-जैसे विकास हुआ समय बीता तो इस परिभाषा में व्यापकता आती गई और वर्तमान में गरीबी का मल्टी-डाइमेंशनल अप्रोच, हिंदी में बहुआयामी दृष्टिकोण अप्लाई होता है और बहुआयामी दृष्टिकोण कहता है कि गरीबी केवल ‘रोटी-कपड़ा और मकान’ का अभाव नहीं, गरीबी व्यक्ति की उन आवश्यकताओं की कमी को दर्शाता है जिनके बिना जीवन यापन संभव नहीं, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता ये सब भी शामिल हैं। लोगों को भोजन उपलब्ध करा दें और हम कहें हमने गरीबी कम कर ली, क्यों नहीं होगी क्योंकि इसके शेष आयाम पूरे होने आवश्यक हैं ’एक्स’ पार्टी सरकार बना गई। उन्होंने वादा किया था लोगों से हम गरीबी कम करेंगे। गरीबी कम करने के लिए पॉलिटिकल पार्टीज़ क्या करती हैं गरीबी रेखा को प्लस-माइनस करती रहती हैं। मतलब लाइन प्लस-माइनस करोगे तो कोई एक व्यक्ति मान लेते हैं राम, तो राम गरीब है या नहीं लाइन चेंज करोगे तो उसकी कैटेगरी… जब ये गरीब है तो आप इसको योजनाओं का लाभ दे रहे हो, गरीब नहीं है तो योजनाओं का लाभ वास्तव में उसकी गरीबी कम हुई नहीं आपने लाइन चेंज कर दी। उससे बोले अब आप निर्धन नहीं, बोले कैसे बोले देखो न सरकार बनी इन्होंने गरीबी कम कर दी, बोले किसकी गरीबी कम कर दी भाई हमें तो कुछ मिला नहीं। ये होता है। क्या लगता है आपको भारत में इतने पढ़े लिखे लोग हैं कि समझ पाएंगे गरीबी कम कैसे हुई? जो पढ़े लिखे लोग हैं उनको समझाइये यदि हम समाज से गरीबी कम कर लें, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग सीधे तौर पर अमीर बन जाएंगे। अर्थशास्त्र (Economics) में ‘गरीब’ का विलोम ‘अमीर’ नहीं होता। अक्सर लोग यह कहते हैं कि अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ रहा है, लेकिन अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से इसके लिए दो विशिष्ट शब्द हैं ‘निर्धन’ और ‘अनिर्धन’। जब हम निर्धनता कम करते हैं, तो व्यक्ति निर्धन से अनिर्धन (Non-poor) की श्रेणी में आता है, न कि अमीर। उदाहरण के लिए, यदि हम ₹40 प्रतिदिन से कम कमाने वाले को गरीब मानते हैं और किसी की आय बढ़कर ₹41 हो जाए, तो उसे अमीर कहना एक मज़ाक होगा। इसलिए, निर्धन का सही विलोम ‘अनिर्धन’ है भारत को स्वतंत्र हुए 80 वर्ष होने जा रहे हैं, फिर भी देश में करोड़ों लोग आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी कम न होने के पारंपरिक कारणों जैसे जनसंख्या आदि के अतिरिक्त, सबसे प्रमुख कारण यह है कि हम आज तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वास्तव में ‘गरीब’ कौन है? जब सरकार जनता से पूछती है कि गरीब कौन है, तो हर व्यक्ति स्वयं को गरीब बताने के लिए हाथ उठा देता है। यदि किसी धनी व्यक्ति से पूछा जाए कि वह गरीब कैसे है, तो वह स्वयं की तुलना किसी और अधिक संपन्न व्यक्ति से करके स्वयं को गरीब सिद्ध करने का प्रयास करता है। यद्यपि अधिक जनसंख्या गरीबी का एक कारण है, किंतु गरीबी की स्पष्ट परिभाषा और पहचान का अभाव भारत में निर्धनता उन्मूलन की राह में सबसे बड़ी बाधा है समाज में व्याप्त मृत्युभोज की कुप्रथा पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि जब किसी परिवार के सदस्य का निधन होता है, तो पूरा गाँव केवल 5 मिनट का शोक मनाता है और तुरंत मृत्युभोज (लड्डू आदि) की योजना बनाने लगता है। शोक संतप्त परिवार के लिए यह दोहरी मार होती है—एक तो प्रियजन को खोने का दुख और दूसरा, गाँव और आस-पास के 10-12 गाँवों को खिलाने के लिए भारी-भरकम धन का इंतजाम करने की चिंता। यह विचारणीय है कि अत्यंत गरीब परिवारों के लिए ऐसी प्रथाएं अनिवार्य नहीं होनी चाहिए। परंपराएं और मान्यताएं अपनी जगह हो सकती हैं, लेकिन इनका पालन पूरी तरह स्वेच्छा पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी सामाजिक दबाव या मजबूरी में।
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