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भारतीय मीडिया की सच्चाई सच की कीमत या सरकारी वाहवाही ? लॉर्ड वेल्सली के ‘हथियार’ का आधुनिक चेहरा।

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांगों के लिए बिल्कुल निःशुल्क काम करने वाले तोशियास सचिव ने बताया कि अंग्रेजों से तुम लोगों ने उम्मीद भी कैसे कर ली कि अखबार हमने सच्ची खबर दिखाने के लिए बनाए होंगे। सुनो असली कहानी। मैं लॉर्ड वेल्सली हूं। हमें भारत पर राज चाहिए था आराम से, बिना सिरदर्द। इसलिए हर शहर, हर चौक पर खबरों की नली हमारी मुट्ठी में चाहिए थी। सत्रह सौ अस्सी में जेम्स ऑगस्टस हिकी ने पहला अखबार बंगाल गजट निकाला। तभी समझ आ गया कि यह कागज हाथ से फिसला तो एक खबर भी भीड़ को भड़का सकती है। इसलिए सत्रह सौ निन्यानवे में हमने प्रेस पर सेंसरशिप ठोक दी। जो हमें सूट करे वही छपे। जो ज्यादा सच बोले उसे वही दबा दो। प्रेस बंद, मशीनें सील। हमें तारीफ की लत थी, सवालों से एलर्जी। कानून हमारे, फैसले हमारे और अखबार में बस हमारी ही वाहवाही छपनी चाहिए थी। लंदन में कहानी पकती, भारत में परोस देते। अंग्रेजी प्रेस हमारा सबसे तेज हथियार था। अठारह सौ सत्तावन की आग ने हमें हिला दिया। समझ गए कि एक सच्ची खबर भी शहर जला सकती है। इसलिए हमने प्रेस की गर्दन और कसकर दबा दी। हम अंग्रेज तो चले गए तो उम्मीद है आज की मीडिया सच दिखाती होगी।

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