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बिहार के दिव्यांग बिहार सरकार के तुगलकी फरमान से हो रहे हैं परेशान

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : बिहार के दिव्यांग बिहार सरकार के तुगलकी फरमान से हो रहे हैं परेशान बिहार में शिक्षक बहाली जो सातवें चरण का हो रहा है 2023 मे वह दिव्यांग के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर रहा है एक तरफ तो सरकार का यह सर्कुलर है जो 8 वर्षों से बिहार में लागू है की जो भी छात्र दिव्यांग है वह अपने निवास स्थान के जो सरकारी अस्पताल है वहां जो सरकारी सिविल सर्जन नियुक्त किए गए हैं वही आपका दिव्यांग प्रमाण पत्र बना देंगे और वह दिव्यांग प्रमाण पत्र पूरे भारत में वैलिड होगा और सभी नियुक्तियों में वह योग्य माना जाएगा दूसरी तरफ शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार है और वैसे राज्य जहां शिक्षा के आधार पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी का नियुक्ति राष्ट्रपति के रूप में हुआ था वहां शिक्षा का स्तर इतना गिर चुका है कि शिक्षक रोड पर बैठने के लिए विवश हो चुके हैं शिक्षक बनने से पहले उनको अनगिनत लाठियां खानी पड़ती है सरकार का प्रताड़ना झेलना पड़ता है और तब लड़ झगड़ कर वह शिक्षक बन पाते हैं तो बिहार में शिक्षा की दुर्दशा इस प्रकार का क्यों है इसका जवाब दिया जाए और यह जो कहा जाता है कि शिक्षा सभी का मौलिक अधिकार है सरकार ने इसे अपने पैरों तले कुचल दिया है अनपढ़ व्यक्ति मंत्री बन जा रहे हैं जिन पर हत्या का आरोप है वह नेतृत्व करता है और जो समाज में शिक्षा का अलख जगा रहा है समाज को संविधानिक अधिकार से अवगत करा रहा है वह आज दर-दर की ठोकरें खा रहा है आखिर क्यों क्या इतना नीचे अस्तर पर गिर चुका है हमारा समाज आप यह बता दीजिए कि भारतीय संविधान भारतीय लिखित है वर्णित है और पारित है और उसमें जो सर्कुलर बना हुआ है उसके आधार पर भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उनका अधिकार मिलता है हम बात कर लेते हैं दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 की जो लाचार है बीमार है और पढ़ाई एक ऐसा माध्यम है जिससे वह आत्मनिर्भर बनेंगे स्वाबलंबी बनेंगे जो लिखित है वर्णित है पारित है फिर भी सरकार उस संविधानिक अधिकार को देने में आखिर क्यों बेबस है यह सोचने की बात है और जब वह दिव्यांगों को संविधानिक अधिकार नहीं दे सकता है तो किसको देगा ऐसा बात हम इसलिए कर रहे हैं कि आप बिहार में सातवें चरण का जो शिक्षक बहाली 2023 में हो रहा है उसको ध्यान से देखेंगे जिसका विज्ञापन संख्या- Adv no – 26/2023 है सरकार ने कहां कि बीमार हो लाचार हो दिव्यांग हो तो तुमको भागदौड़ से बचाने के लिए और दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 को पूर्ण रुप से लागू करने के बाद आप की स्थानीय अस्पताल में आपको दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाने के लिए हम स्वीकृति देते हैं और दिव्यांग अधिकार अधिनियम के प्रति हमारी सच्ची सहानुभूति है एवं हम उसके प्रति हम विशेष ध्यान देते हैं तो यह कैसा ध्यान देना है जिसमें दिव्यांगों का जो अस्तित्व है या प्रारंभिक दौर का जो प्रतिक्रिया है उससे ही उसे वंचित किया जाए आखिर क्यों जब आपने स्थानीय अस्पताल में सभी प्रमाण पत्र को सत्यापित करवा दिया बनवा दिया वह पूरे भारत में लागू है तो आपको अपने मेडिकल एक मेडिकल स्टाफ के द्वारा बनाए गए प्रमाण पत्र पर विश्वास क्यों नहीं है कि आपने तुगलकी फरमान जारी कर दिया कि दुबारा से पीएमसीएच आकर अपने गार्जियन के कंधे पर बैठकर प्रमाण पत्र सत्यापित करवाएंगे क्या अब सरकार को अपने एक मेडिकल ऑफिसर पर विश्वास नहीं है कि दूसरे मेडिकल ऑफिसर से पीएमसीएच में सत्यापन की बात कर रहे हैं और यह सब हो रहा है जब बिहार के पूर्व के सामाजिक कल्याण न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव श्री अतुल प्रसाद जी जो मंजू वर्मा प्रकरण में भी शामिल थे उन्हें रिटायर के बाद विशेष कार्यभार देकर बीपीएससी का सचिव बना दिया गया है और उनके द्वारा यह तुगलकी फरमान जारी होता है जब बिहार में दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 का रक्षक ही भक्षक का रूप धारण कर लेगा तो समाज का क्या होगा यह सोचने की बात है एक तरफ तो जहां यूनिक डिसेबिलिटी की प्रतिक्रिया के तहत बिहार में बहुत से अस्पताल में दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाना ही बंद कर दिया है बहुत से सिविल सर्जन को दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाने का सर्कुलर ही पता नहीं है तो दूसरी तरफ इस प्रकार का तुगलकी फरमान जिससे दिव्यांग अपने दिव्यांगता का प्रमाण जहां से शुरू किए थे वही समाप्त हो गया मैं यह बात इसलिए कर रहा हूं कि डीएलएड और बीएड एलआईसी की तरह पढ़ाई के अंतिम में अरिक्त कोर्स होता है जिसे कंपटीशन देने के बाद m.a. b.a. करने के बाद लोग करते हैं इस आशा में कि कोई भी प्रतियोगिता परीक्षा को उत्तीर्ण नहीं कर पाए तो इसमें हमारी बहाली हो जाएगी लेकिन सरकार के इस तुगलकी फरमान से बिहार के 5100000 दिव्यांग काफी आहत है क्योंकि यह सवाल उनके अस्तित्व का है लोग कहते हैं कि दिव्यांग हो पढ़ लिख लो नौकरी हो जाएगी एक दिव्यांग प्रारंभिक दौड़ में दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाया और अंतिम दौड़ तक पढ़ाई करते रहो अपने जीवन में संघर्ष करते रहे और अंतिम दौड़ में आकर प्रारंभिक दौड़ के सर्टिफिकेट पर दिव्यांग प्रमाण पत्र पर अगर सवाल खड़ा हो जाए तो ऐसी सरकार पर धिक्कार है

बिहार सरकार के द्वारा क्या तुगलकी फरमान दिया गया है उसे जरा ध्यान से देखिए कैसे हम कह सकते हैं पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया इंडिया के सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं पर अपने राज्य के छात्रों को उस योग्य बनाना नहीं चाहते हैं क्या महान दार्शनिक अरस्तु ने कहा है की हम किसी राज्य के विकास की कामना तब कर सकते हैं जब वहां का प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो और रोजगार को पा लिया हो और आत्मनिर्भर बन गया हो वैसे लाचार और बीमार दिव्यांग जिसे आमतौर पर प्राइवेट जॉब मिलता नहीं है और सरकारी जॉब मिलेगा नहीं क्योंकि आप दिव्यांग प्रमाण पत्र से खिलवाड़ कर दिए हैं या कर रहे हैं तो यह दिव्यांग किसके शरण में जाएं आप ही बता दीजिए अपनी व्यस्तता में से टाइम निकालना होगा और दिव्यांगों को जवाब देना होगा सिर्फ अपना कल्याण नहीं करना होगा राज्य के पढ़े-लिखे दिव्यांग छात्रों का भी कल्याण करना आवश्यक है आप नेतृत्व करता है आपको समाज के बीच आकर इस जटिल समस्या का जवाब देना होगा क्योंकि योग्यता और क्षमता सबके अंदर है आज जो रोड पर बैठे हुए हैं कल सत्ता में बैठ जाए तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन उस ओर कोई ध्यान ही नहीं देता है इसलिए आप बचे हुए हैं आइए जानते हैं क्या है तुगलकी फरमान -दिव्यांग है परेशान पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल, पटना सूचना विज्ञापन संख्या – 26 / 2023, शिक्षा विभाग, बिहार के अन्तर्गत विद्यालय अध्यापक के पदों पर नियुक्ति के संबंध में चलन दिव्यांग (OH), मनोविकार दिव्यांग एवं बहुदिव्यांग (MD) एवं दृष्टि दिव्यांग (VI) का दिव्यांगता प्रमाण-पत्र निर्गत करने हेतु संबंधित उम्मीदवार अपना नाम, पता, मोबाईल नम्बर, आधार कार्ड की छायाप्रति के साथ अधीक्षक, पी०एम०सी०एच०, पटना के नाम से आवेदन कार्यालय के आगत शाखा में जमा करेगें। दिव्यांगता जाँच हेतु सभी उम्मीदवार को निर्धारित तिथि को उपस्थित होने की सूचना उनके मोबाईल फोन द्वारा दिया जायेगा । आवेदन के साथ दिव्यांग है। करना जान-पत्र की छायाप्रति संलग्न इसलिए हम बिहार सरकार से यह मांग करते हैं कि दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 की जो सबसे बड़ी विशेषता है की समानता का अधिकार मिलेगा सबको और भागदौड़ से दिव्यांगों को निजात मिलेगा उसको देखते हुए इस नियम में संशोधन किया जाए और इसके लिए मुख्यमंत्री जी से डायरेक्ट मिलकर और मुख्यमंत्री सचिवालय में जाकर इस समस्या के निदान की बात समाधान की बात की जाएगी ताकि दिव्यांगों को उनके संविधानिक अधिकार उनके मौलिक अधिकार उनके शिक्षा के अधिकार से जोड़ा जाए इसीलिए तो कहते हैं दिव्यांगों की मुस्कान है हमारी पहचान।

 

 

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