सर्वप्रथम न्यूज सौरभ कुमार : दिव्यांगों के लिए बिल्कुल निःशुल्क काम करने वाले तोशियास सचिव ने बताया कि दिव्यांगों को ऋण प्रदान करने के विषय में बैंकों का व्यवहार अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और प्रायः वे असत्य का सहारा लेते हैं। वास्तविकता यह है कि अधिकांश बैंक कर्मियों को स्वयं बैंकिंग प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान नहीं होता बैंकिंग जगत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है, जिसे ‘आंशिक आरक्षित बैंकिंग’ कहा जाता है। यदि किसी बैंक के पास एक सहस्र करोड़ रुपये की जमा राशि है, तो वह नियमतः दस सहस्र करोड़ रुपये तक का ऋण दे सकता है। सामान्य शब्दों में कहें तो, बैंक के पास रखे प्रत्येक सौ रुपये के बदले वह एक सहस्र रुपये का ऋण देने की क्षमता रखता है। दशकों से वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था इसी आधार पर संचालित हो रही है एक सामान्य बैंक अधिकारी के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं होता कि यदि उसके पास जमा राशि केवल एक सहस्र करोड़ है, तो वह शेष नौ सहस्र करोड़ रुपये कहाँ से लाया। वास्तव में, बैंक यह धन भौतिक रूप से कहीं से लाते नहीं हैं, बल्कि ऋण देते समय वे इसे केवल अपनी लेखा-पुस्तकों में अंकित करके सृजित करते हैं। यह विडंबना ही है कि जो संस्थान इस प्रकार शून्य से धन का सृजन करने की शक्ति रखते हैं, वे ही समाज के वंचित और दिव्यांग वर्ग को सहायता देने के समय संसाधनों के अभाव का मिथ्या प्रलाप करते हैं अतः, जब बैंक अधिकारी दिव्यांगों को ऋण देने में आनाकानी करते हैं, तो वे केवल अपनी अज्ञानता अथवा संवेदनहीनता का परिचय दे रहे होते हैं मान लीजिए आप बाहर जाते हैं और वर्षा का सुहावना मौसम देखकर चाय पीने का विचार करते हैं। एक चाय विक्रेता, विशेषकर दिल्ली के मुखर्जी नगर जैसे क्षेत्रों में, दिन भर में लगभग एक सहस्र प्याली चाय बेच लेता है। यदि एक प्याली चाय का औसत मूल्य दस रुपये मान लिया जाए, तो उसकी दिन भर की कुल बिक्री दस सहस्र रुपये होती है यदि हम उसकी वास्तविक लागत और व्यय पर विचार करें, तो प्रतिदिन का खर्च लगभग दो से तीन सहस्र रुपये होता है। इस प्रकार, वह प्रतिदिन सात सहस्र रुपये की शुद्ध आय प्राप्त करता है। इस गणना के अनुसार, वह एक मास में दो लाख दस सहस्र रुपये कमाता है और यदि वार्षिक स्तर पर देखा जाए, तो यह राशि पच्चीस लाख रुपये से भी अधिक हो जाती है यद्यपि यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि प्रतीत होती है, किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि आप अपना लक्ष्य त्यागकर चाय का व्यवसाय ही आरंभ कर दें लोकतंत्र का आगमन वास्तव में समाज और शासन के बीच एक गहरा समझौता है। हमने सरकार का चयन मात्र व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि एक गरिमामय और श्रेष्ठ जीवन सुनिश्चित करने के लिए किया है। एक नागरिक के रूप में लोकतंत्र को चुनने का हमारा प्राथमिक उद्देश्य अपनी उन परिस्थितियों को सुरक्षित करना है, जो हमारे सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य हैं। इन परिस्थितियों को ही हम ‘अधिकार’ कहते हैं। अधिकार केवल कानूनी शब्द नहीं हैं, बल्कि वे हमारे व्यक्तित्व के उत्थान और जीवन की गुणवत्ता के आधार स्तंभ हैं अतः, एक जागरूक और आदर्श नागरिक वही है जो न केवल अपने कर्तव्यों को समझे, बल्कि समय-समय पर अपने अधिकारों की महत्ता को भी पहचाने। यदि हम एक उन्नत जीवन की अभिलाषा रखते हैं, तो यह आवश्यक है कि हम सजग रहें और निरंतर उन अधिकारों की मांग करें जो हमारे विकास में सहायक हों। लोकतंत्र की जीवंतता इसी में निहित है कि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें और उनके लिए अपनी आवाज बुलंद करें गांधी जी का यह कथन अत्यंत मर्मस्पर्शी है कि हम अपने चरित्र का सूक्ष्म निरीक्षण इसलिए नहीं करते क्योंकि हम अपनी कमियों का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाते। यदि हम अपने चरित्र पर दृष्टि डालें, तो हमारा वास्तविक स्वरूप हमारे सम्मुख प्रकट हो जाएगा और वह सत्य इतना कठोर होता है कि हम उसे सहन नहीं कर पाते। इसी भय के कारण हम आत्म-चिंतन से विमुख रहते हैं और स्वयं को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं आज मनुष्य ने अपने व्यक्तित्व के चारों ओर एक मिथ्या आवरण अथवा मुखौटा निर्मित कर लिया है। हम संसार के समक्ष जो प्रदर्शन करते हैं और वास्तव में जो हमारा यथार्थ है, उन दोनों के मध्य एक विशाल अंतराल है। इस भेद का मुख्य कारण यह है कि हमने ‘आत्म-अन्वेषण’ अथवा स्वयं की खोज पर कभी कार्य ही नहीं किया। जब तक हम अपने चरित्र की गहराइयों को नहीं समझेंगे, हम अपने अस्तित्व को भी नहीं समझ पाएंगे आत्म-बोध के इसी अभाव के कारण हमारे नैतिक मानदंडों का निरंतर पतन हो रहा है। जब हम स्वयं को ही नहीं पहचानते, तो दूसरों के प्रति संवेदनशीलता भी समाप्त हो जाती है, जिससे हमारे ‘अंतर्वैयक्तिक संबंध’ शिथिल और दुर्बल होने लगते हैं। यदि मैं दूसरे व्यक्ति की प्रकृति और उसकी भावनाओं को समझने में अक्षम हूँ, तो मेरे लिए उससे मित्रता का संबंध स्थापित करना असंभव हो जाता है। अतः, जीवन में नैतिकता और प्रगाढ़ संबंधों की स्थापना हेतु आत्म-साक्षात्कार ही प्रथम सोपान है जब आप दर्पण में स्वयं को देखते हैं, तो वह प्रकाश का पूर्ण परावर्तन नहीं करता। संसार का कोई भी श्रेष्ठ दर्पण, जिसे हम सामान्यतः क्रय कर सकते हैं, प्रकाश को शत-प्रतिशत वापस नहीं भेजता। एक उत्तम श्रेणी का दर्पण भी अधिक से अधिक पचानवे प्रतिशत प्रकाश को ही परावर्तित कर पाता है और शेष पाँच प्रतिशत प्रकाश को वह स्वयं सोख लेता है। इसका अर्थ यह है कि दर्पण में आप स्वयं को देखकर जो छवि पाते हैं, वह आपके वास्तविक स्वरूप का केवल आंशिक भाग है। आप वास्तव में उस छवि से कहीं अधिक सुंदर और प्रभावशाली हैं यदि दर्पण पूर्ण परावर्तन करता, तब हमें अपना वास्तविक और संपूर्ण स्वरूप दिखाई देता। यही कारण है कि अन्य व्यक्ति आपको देखकर अधिक प्रसन्न होते हैं क्योंकि वे आपको किसी दर्पण के माध्यम से नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देख रहे होते हैं। प्रत्यक्ष दर्शन में व्यक्ति का स्वरूप अधिक स्पष्ट और निखरा हुआ दिखाई देता है अतः, दर्पण में अपनी छवि देखकर कभी भी मन में हीन भावना अथवा न्यूनता का विचार नहीं लाना चाहिए। सदैव यह विश्वास रखें कि आप अपनी दिखाई देने वाली छवि से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। सामान्य दर्पणों की गुणवत्ता को देखते हुए, हमें यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा वास्तविक स्वरूप दर्पण की छवि से दस प्रतिशत अधिक उत्तम है। अपनी वास्तविकता पर गर्व करें, क्योंकि आप दर्पण की सीमाओं से कहीं अधिक सुंदर और पूर्ण हैं।
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