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नीति आयोग का फैसला आपके निवास स्थान का सरकारी अस्पताल अब प्राइवेट हाथों में

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : केंद्र सरकार सरकारी जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है। यदि यह योजना पास हो जाती है तो निजी व्यक्ति या संस्थान मेडिकल कॉलेज की स्थापना और उसे चलाने के लिए भी जिम्मेदार होंगे और इन मेडिकल कॉलेजों से सेकेंडरी हेल्थकेयर सेंटर को जोड़ा जा सकता है। ये सेंटर भी निजी हाथों से नियंत्रित होंगे।केंद्र की प्रमुख थिंक टैंक नीति आयोग ने ‘पीपीपी मॉडल के तहत नए और मौजूदा निजी मेडिकल कॉलेज से जिला अस्पतालों को जोड़ने की योजना’ को लेकर 250 पन्नों का दस्तावेज जारी किया है। इसके माध्यम से इस योजना में हिस्सा लेने वालों (शेयरधारकों) से प्रतिक्रिया मांगी गई है।

इस महीने के अंत में शेयरधारकों की एक बैठक की तारीख तय की गई है। इस तरह के जिला अस्पतालों में कम से कम 750 बेड होने चाहिए। इसमें लगभग आधे “मार्केट बेड” और बाकी “रेग्यूलेटेड बेड” के रूप में होंगे। मार्केट बेड की कीमत बाजार के आधार पर होगी। इसी की बदौलत रेग्यूलेटेड बेड पर छूट दी जा सकेगी।

इस योजना की आवश्यकता के पीछे की वजह को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि ‘केंद्र और राज्य की सरकार अपने सीमित संसाधन और सीमित खर्च की वजह से चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अंतर को नहीं समाप्त कर सकती है। ऐसे में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने और मेडिकल की पढ़ाई की लागत को तर्कसंगत बनाने के लिए यह जरुरी है।’

इस योजना को देख रहे अधिकारियों का कहना है कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप योजना के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए काम पर आधारित है। इसके तहत जिन लोगों को इस योजना को लागू करने के लिए छूट मिलेगी वे मेडिकल कॉलेज का डिजाइन, निर्माण, वित्त, संचालन और रखरखाव करेगें और संबंधित जिला अस्पताल का संचालन और रखरखाव भी करेगें।

आयोग के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “वैसे राज्य जहां जिला अस्पतालों की हालत सही नहीं है या जहां मेडिकल सेक्टर धन के लिए संघर्षरत है, वे अपनी स्वेच्छा से इस योजना को लागू कर सकते हैं।” काफी विमर्श के बाद इस मसौदे को तैयार किया गया है। मसौदे में कहा गया है कि इस योजना के लागू होने से मेडिकल कॉलेजों की कमियां दूर होंगी और जिला अस्पतालों की हालत काफी अच्छी हो जाएगी। हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस पर शंका जता रहे हैं।

जन स्वास्थ्य अभियान के नेशनल को-कनवेनर डॉ. अभय शुक्ला कहते हैं, “इस नीति की वजह से स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और गुणवत्ता से समझौता करना पड़ेगा, खासकर गरीबों को। हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में निवेश की जरुरत है। किसी का यह कहना कि हमारे पास लिए संसाधन नहीं हैं, यह एक हास्यास्पद तर्क है क्योंकि हमारा स्वास्थ्य सेवा खर्च दुनिया में सबसे कम है।”

जेएसए और एसोसिएशन ऑफ डॉक्टर्स फॉर एथिकल हेल्थकेयर ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए सरकार को पत्र लिखने का फैसला किया है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की प्रिया बालासुब्रह्मण्यम ने कहा कि इस तरह की व्यवस्थाओं में भले ही कुछ बेड मुफ्त हों, लेकिन जो मरीज भुगतान नहीं कर पाएंगे उन्हें न के बराबर प्राथमिकता दी जाएगी। ऐसे मॉडल में निजी पार्टियों पर जवाबदेही तय करना मुश्किल हो सकता है। इनके साथ ही कई अन्य ने भी इसके खिलाफ तीखी आपत्ति जताई है।

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