सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : लोककल्याणकारी राज्य
“अगर आप मुझसे जानना चाहते हैं कि आदर्श समाज कैसा होगा, तो मेरा आदर्श समाज ऐसा होगा संविधान के भाग-4 के अनुच्छेद 38, 41, 46 और 47 इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।अनुच्छेद 38 में राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह जनता के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक व्यवस्था कायम करें। अनुच्छेद 41 का संबंध कुछ स्थितियों में काम के अधिकार, शिक्षा के अधिकार और लोक सहायता पाने के अधिकार से है। अनुच्छेद 46 का मकसद अनुसूचित जातियों और अन्य कमजोर दिव्यांग तबकों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना है। अनुच्छेद 47 में राज्य को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी है कि वह जनता के पोषण और जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास करेगा और जनता के स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाएगा।समता और समानता, दोनों ही अवधारणाओं का आधार निष्पक्षता है। लेकिन इसके लिए अपनाए जाने वाले साधनों में भिन्नताएं हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति और एक बच्चा कुछ ऊंचाई पर रखी किसी चीज तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं तो वयस्क व्यक्ति अपना हाथ बढ़ाकर ही उस चीज तक पहुंच सकता है, जबकि बच्चे को उस तक पहुंचने के लिए चौकी जैसी किसी ऊंची चीज की जरूरत होगी। समानता के अंतर्गत जिस बात पर जोर दिया जाता है वह है-सबको बराबरी का दर्जा देना, इसीलिए इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि बच्चा वयस्क व्यक्ति की बराबरी नहीं कर सकता। इसमें बच्चे को चौकी जैसी कोई चीज उपलब्ध नहीं करायी जाती। लेकिन समता का मतलब है बच्चे को भी बराबरी का मौका उपलब्ध कराने के लिए चौकी दी जाए ताकि वह भी बाछित ऊंचाई तक पहुंच सके। इसी तरह के समतामूलक समाज की परिकल्पना सर्वोदय और अंत्योदय में भी की गयी है जिसके अंतर्गत समाज के सबसे आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचकर ‘सबका विकास’ करने की बात सोची गयी है।देश में सीमांत या वंचित समुदायों का एक बड़ा वर्ग है जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग, अन्य पिछड़े वर्गों के लोग, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन, यायावर तथा अर्ध-यायावर लोग, ट्रांसजेंडर तथा भिखारियों का एक बड़ा वर्ग शामिल है। स्वतंत्रता के वाद से समाज और सरकारें उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए हर स्तर पर सतत प्रयास करते रहे हैं। समाज के इन्हीं लोगों को अधिकार संपन्न बनाने के लिए केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय गठित किया गया था।लोगों के लिए सुविधाओं और अवसरों की कमी उन्हें अपनी पूरी क्षमता और दक्षता के विकास के उद्देश्य को हासिल करने से रोकती है। देश के सामने भुखमरी पूरी तरह समाप्त करने की चुनौती बनी हुई है। देश में आर्थिक सुधार पर अमल के बाद के पच्चीस से अधिक वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव किये गये हैं जिनसे हमारे नीति-निर्माताओं को अपना ध्यान कृषि से हटाकर विनिर्माण और सेवा क्षेत्र पर केन्द्रित करने को प्रेरित किया है। लेकिन आज एक बार फिर हमारी प्राथमिकता अपना ध्यान कृषि पर केन्द्रित करने और इसके माध्यम से खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना, गरीबी कम करना तथा रोजगार के अवसर पैदा करना हो गयी है।समाज के कमजोर वर्गों, खास तौर पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करते हुए विधायी उपायों समेत अनेक प्रयास किये गये हैं और उन्हें सामाजिक अन्याय तथा सभी प्रकार के शोषण से बचाने के लिए कदम उठाये गये हैं। चिकित्सा संबंधी कारणों को छोड़कर अन्य किसी भी कारण से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली नशीली दवाओं और अन्य मादक पदार्थों के संवन पर रोक लगाने के लिए कदम उठाये गये हैं। इस संबंध में नये और कई अन्य उपायों को आवश्यकता है। समूची व्यवस्था में ऐसा दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है जिससे विभिन्न समुदाय आपस में जुड़ें ताकि मादक पदार्थों के दुरुपयोग के बारे में उनकी सामूहिक जवाबी कार्रवाई सशक्त हो सके। लोक नीति का दिव्यांगता के सामाजिक मॉडल की तरफ झुकाव, दिव्यांगता की दृष्टि से समावेशी समाजों के निर्माण की नई राह दिखलाता है। दिव्यांगता की दृष्टि से समावेशी समाज में ऐसी लोक नीतियां होंगी जो दिव्यांग लोगों के लिए उदार ही नहीं होंगी, बल्कि वे व्यक्ति-व्यक्ति में शारीरिक या अन्य अंतर भी सहर्ष स्वीकारेंगी। इतना ही नहीं, ये तमाम मानवीय विभिन्नताओं के प्रति हमेशा संवेदनशील भी रहेंगी।पूरा विश्व आज कोविड-19 महामारी के अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक विकास के जरिए एक समावेशी समाज का निर्माण किया जाए जिसमें जरूरत पड़ने पर पुनर्वास की भी व्यवस्था की जाए।
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