सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : भारत देश और सभी राज्यों के चुनाव में सभी चुनाव में दिव्यांगों के नाम पर करोड़ों रुपया का विज्ञापन डाक मतदान का बात किया जाता है लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है बिहार के 54 लाख दिव्यांग में से 1% दिव्यांगों को भी इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाता है और ग्रामीण क्षेत्र में तो यह सुविधा 100 प्रतिशत नहीं मिलता है बहुत सारे पोलिंग एजेंट को तो यह भी पता नहीं होता है कि ऐसा कोई सुविधा भी है तो सवाल यह खड़ा होता है कि सदियों से इस नाम पर लाखों करोड़ों रुपया विज्ञापन पर खर्च कर दिए जाते हैं भारत लिखित सर्कुलर पर चलता है संवैधानिक व्यवस्था पर चलता है सिर्फ विज्ञापन लगा देने से दिव्यांगों को लाभ मिल जाएगा क्या जबकि आपके पोलिंग एजेंट को इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं दूसरी बात यह कि इस सुविधा का लाभ लेने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना होता है और रजिस्ट्रेशन की कोई सुविधा कोई जानकारी किसी दिव्यांग को नहीं होता 90% दिव्यांग होने के बाद भी लोग लाचारी में अपना मतदान गिराने आते हैं लेकिन वहां चौथा स्तंभ भी मौजूद होता है वह लाचारी का फोटो लेता है और अपने पेपर में प्रसिद्धि के लिए छपता है लेकिन कोई यह नही पूछता है की संवैधानिक व्यवस्था जो बड़े-बड़े पोस्टरों में लगे हुए हैं हर चौक चौराहा पर पोस्टरों में दिव्यांगता को प्रदर्शित किया जाता है और हुई चेयर लगा हुआ एक पोस्टर आपको जरूर से मिल जाएगा लेकिन पोस्ट वोटिंग सुविधा जो दिव्यांगों के लिए है इसके लिए विशेष रजिस्ट्रेशन करवाया जाता है और घर पर जाकर वह वोटिंग करवाई जाती है नजारत क्यों है उसका पैसा कहां गया क्या ट्रेनिंग पीरियड की शिक्षा नहीं दी जा सकती है राज्य के नेतृत्व करता कई बार मुख्यमंत्री बन गया है प्रधानमंत्री बनने की सपना देख रहे हैं लेकिन राज्य के 5400000 दिव्यांगों की चिंता कौन करेगा और जब लोकतंत्र के महापर्व के सर्कुलर से दिव्यांगता को गायब किया जा सकता है उसकी सुविधा को गायब किया जा सकता है और उसके पैसे का उपयोग करके बड़ा बड़ा पोस्टर लगाकर सहानुभूति दिया जाता है तो निश्चित तौर से यह मान लीजिए कि लोकतंत्र अपने खतरनाक समय से गुजर रहा है आइए जाते हैं विस्तार पूर्वक कि क्या है यह योजना डाक मतदान ( क्या होता है)जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि Postal ballot एक डाक मत पत्र होता है. यह 1980 के दशक में चलने वाले पेपर्स बैलेट पेपर की तरह ही होता है. चुनावों में इसका इस्तेमाल उन लोगों के द्वारा किया जाता है जो कि अपनी नौकरी के कारण अपने चुनाव क्षेत्र में मतदान नहीं कर पाते हैं. जब ये लोग Postal Ballot की मदद से वोट डालते हैं तो इन्हें Service voters या absentee voters भी कहा जाता है.कब से हुई शुरूआत पोस्टल बैलेट की शुरुआत 1877 में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में हुई थी. इसे कई देशों जैसे इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, स्विट्ज़रलैंड और यूनाइटेड किंगडम में भी इस्तेमाल किया जाता है. हालाँकि इन देशों में इसके अलग अलग नाम जरूर हैं.भारतीय चुनाव आयोग ने चुनाव नियामावली, 1961 के नियम 23 में संशोधन करके इन लोगों को चुनावों में Postal ballot या डाक मत पत्र की सहायता से वोट डालने की सुविधा के लिए 21 अक्टूबर 2016 को नोटिफिकेशन जारी किया गया था.जब भी किसी चुनाव में वोटों की गणना शुरू होती है तो सबसे पहले पोस्टल बैलेट की गिनती शुरू होगी. इसके बाद ईवीएम में दर्ज वोटों की गिनती होगी. पोस्टल बैलेट की संख्या कम होती है और ये पेपर वाले मत पत्र होते हैं इसलिए इन्हें गिना जाना आसान होता है. तो अब आपको Postal ballot के बारे में ज्ञात हो गया होगा लाचार और दिव्यांग अधिकार से वंचित हो रहा है तो किससे यह अपना अधिकार प्रदान करवाएंगे यह सोचने की बात है दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 लिखित है प्रमाणित है और वर्णित है खुलेआम इसकी धज्जियां उड़ाई जा रही है आखिर क्यों और ऐसा करने का अधिकार पदाधिकारियों को किसने प्रदान किया है यह बात बिहार और भारत के तमाम दिव्यांग जानना चाहते हैं अगर भारत में बना कानून का लाभ भारत में नहीं मिल पाया तो क्या विदेशों में मिल पाएगा वह भी लाचार और विवाद के साथ ऐसा नीति को अपनाया जा रहा है।
