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यूनिवर्सल राइट डे क्या है दिव्यांगों को मिला सबसे बड़ा तोहफा

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार की कलम से स्कूल दिव्यांग बच्चे को शिक्षा के अधिकार से नहीं रोक सकता यूनिवर्सल चाइल्ड राइट डे पर यूनिसेफ के स्पेशल एजुकेटर विशेष ऋत्विक पात्रा ने दिया सुझाव स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षा बच्चों का अधिकार है। सभी अभिभावक अपने बच्चों की बेहतर परवरिश करना चाहते हैं, चाहे वह सामान्य बच्चे हों या दिव्यांग। दिव्यांग बच्चों के प्रति समाज हमेशा से ही मानसिकता लेकर चलता है कि ये बच्चे कुछ नहीं कर सकते। कई बार बच्चों के अभिभावक भी बच्चों की क्षमता नहीं पहचान पाते। यूनिवर्सल चाइल्ड राइड डे के मौके पर मंगलवार को एनबीटी और यूनिसेफ के संयुक्त बाल अधिकार अभियान के तहत यूनिसेफ के स्पेशल एजुकेटर ऋत्विक पात्रा ने दिव्यांग बच्चों के अधिकार और समाज में उन्हें होने वाली दिक्कतों से रूबरू करवाया।

जागरूकता की कमी से हाशिए पर रहते हैं ऐसे बच्चे

दिव्यांग बच्चों को तीन दिक्कतों से गुजरना पड़ता है। पहली दिक्कत अभिभावकों की तरफ से होती है। कई बार अभिभावक अपने बच्चे में दिव्यांगता पता नहीं कर पाते, जिससे उन्हें शिक्षा और दूसरे अधिकार नहीं मिलते। दूसरी दिक्कत इंफ्रास्ट्रक्चर और ह्युमन रिसोर्स की आती है। इसके बाद समाज और व्यक्तिगत रूढ़िवादिता से भी ऐसे बच्चों को गुजरना होता है। अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है कि वह यह जानें कि उनके बच्चे में किस तरह की दिव्यांगता है। अगर वह शारीरिक रूप से विकलांग है तो उसे सामान्य स्कूलों में पढ़ने का अधिकार मिलना चाहिए। बौद्धिक और शारीरिक दिव्यांगता पर ही बच्चे को स्पेशल स्कूल भेजना चाहिए। कोई भी स्कूल किसी भी दिव्यांग बच्चे को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता। इसके अलावा स्कूलों में भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो दिव्यांग बच्चों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हो। बच्चों के लिए रैम्प, वील चेयर की व्यवस्था, स्पेशल बेसिक एजुकेटर की नियुक्ति जरूर करें।

समाजिक मॉडल से करें ऐसे बच्चों की पहचान

सरकार और संस्थाएं दिव्यांग बच्चों की पहचान करने के लिए मेडिकल मॉडल का इस्तेमाल करती हैं। मेडिकल मॉडल ऐसे बच्चों की बीमारी का पता लगाते हैं, लेकिन अगर सोशल मॉडल के जरिए दिव्यांगों का पता लगाया जाए और फिर उन्हें मेडिकल मॉडल के जरिए पहचाना जाए तो यह ज्यादा कारगर होगा। सामाजिक मॉडल में हम बच्चों के अभिभावकों से रोजमर्रा के जीवन में आने वाली बाधाओं पर बात करते हैं। अगर हमें यह पता चलता है कि बच्चे को देखने में परेशानी है तो हम डॉक्टर के पास ले जाकर जांच करवाते हैं कि उसे किसी दूसरी तरह की समस्या तो नहीं है।

सरकार दिव्यांग बच्चों के लिए बना रही है पॉलिसी

दिव्यांग बच्चों के लिए समय-समय पर कई योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें जिला स्तर पर को-ऑर्डिनेटर स्कूलों में जाकर दिव्यांग बच्चों के लिए काम करते हैं। इसके अलावा स्पोर्ट्स इवेंट, ब्लाइंड बच्चों के लिए ब्रेल लिपि में टेक्स्ट, लो विजन बच्चों के लिए बड़े अक्षरों की किताबें छापना, मूकबधिर बच्चों के लिए लर्निंग कैम्प, ब्रेल लिपि में स्टेशनरी जैसी कई सुविधाएं हैं। मौजूदा समय में होम स्टडी के भी कॉन्सेप्ट पर विचार किया जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन बच्चों की पहचान नहीं हो पाती, जिससे वह सुविधाओं से वंचित रह जा रहे हैं।

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