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दिव्यांग होने के बावजूद भी जायसी ने दिया अपनी प्रतिभा का परिचय

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : जायसी निजामुद्दीन औलिया के वंशज थे। जायसी प्रतिभा के धनी परंतु शरीर के कुरूप थे। अंतः साक्ष्य के अनुसार जायसी एक नेत्र से विहीन तथा एक कान से रहित थे। एक जनश्रुति के अनुसार शेरशाह सूरी ने इनकी कुरूपता का मजाक उड़ाया था तब इन्होंने बड़े शांत स्वभाव से शेरशाह को जवाब दिया-मोहि का हंससि, के कोहरिहं? अर्थात तुम मुझ पर हंसे हो या उस कुम्हार पर अर्थात ईश्वर पर जिसने मुझे बनाया है। शेरशाह इस बात से अत्यंत लज्जित हुए और इसके बाद उन्होंने जायसी का अत्यधिक सम्मान किया। अमेठी नरेश रामसिंह भी इन्हें अपना गुरु मानते थे। ऐसा माना जाता है कि अमेठी के आसपास के जंगलों में एक शिकारी के तीर लगने से जायसी का निधन हुआ। इनकी मृत्यु सन् 1542 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। अमेठी नरेश ने जायसी की यहीं पर एक समाधि बनवा दी जो अब भी मौजूद है। जायसी की छह प्रमुख रचनाएं मानी गई हैं जिनमें ‘आखिरी कलाम’, ‘पद्मावत’, ‘अखरावट’, ‘मसलनामा’, ‘कहरनामा’ तथा ‘कन्हावत’ है। ‘पद्मावत’ इनकी कीर्ति का आधार स्तंभ है। इस महाकाव्य में चित्तौड़ के राजा रतनसेन तथा सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती के प्रेम का वर्णन किया गया है। जायसी की काव्यगत विशेषताएं इस प्रकार है-जायसी ने अपने काव्य में इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय किया है। ‘पद्मावत’ महाकाव्य इसका प्रमाण है। इस काव्य का पूर्वार्ध यदि कल्पित है तो उतरार्द्ध ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। इसमें रतनसेन, अलाउद्दीन, नागमती, पद्मावती आदि ऐतिहासिक पात्र हैं तथा अन्य पात्र काल्पनिक है। घटनाओं के वर्णन में कवि ने अपनी कल्पना शक्ति का अद्भुत परिचय दिया है। अलाउद्दीन के चित्तौड़ पर आक्रमण की ऐतिहासिक घटना का सुंदर वर्णन हुआ है। पद्मावत का सिंहलद्वीप वर्णन कवि की कल्पना शक्ति कहा अद्भुत उदाहरण है-

सब संसार परथ मैं आए सातौं दीप ।
एक दीप नहिं उत्तिम सिंघलदीप समीप

जायसी का काव्य लोक संस्कृति और लोक जीवन का बहुत सुंदर वर्णन करता है। उन्होंने अपने काव्य में हिंदू-मुस्लिम एकता का तो समर्थन किया ही है, साथ ही भारतीय लोक संस्कृति, तीज-त्योहार, आदर्श, अंधविश्वास, जादू-टोना, मंत्र-तंत्र, तीर्थ-व्रत आदि का भी वर्णन किया है। उन्होंने हिंदू धर्म के सिद्धांतों, विवाह-संस्कार, रहन-सहन का जीवंत वर्णन किया है। पद्मावत की कथा पूर्ण रूप से भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित है। उनके नारी पात्र भारतीय आदर्श नारी का प्रतीक है।पद्मावत केवल जायसी का ही नहीं बल्कि हिंदी साहित्य का सफल एवं लोकप्रिय महाकाव्य है। इसमें कवि ने लौकिक प्रेम के द्वारा अलौकिक प्रेम की व्यंजना की है। यह महाकाव्य सूफी मत के सिद्धांतों के अनुसार आध्यात्मिक प्रेम को अभिव्यक्त करता है।मलिक मोहम्मद जायसी हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के प्रतिनिधि कवि हैं। वे अत्यंत उच्च कोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। हिंदी साहित्य में तुलसीदास और सूरदास के समान ही उनका पर्याप्त महत्त्व है। वे प्रेम की पीर के कवि माने जाते हैं। जायसी के जन्म के संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। मसनवी शैली में रचित उनकी अमर कृति पद्मावत में शाहे वक्त के साथ-साथ कवि का भी परिचय दिया गया है। अंतः साक्ष्य के आधार पर जायसी का जन्म 900 हिजरीके लगभग हुआ माना जाता है। जायसी ने अपनी रचना आखिरी कलाम में एक स्थान पर लिखा है तीस बरस ऊपर कवि बदी।इस आधार पर कहा जा सकता है कि जायसी का जन्म 900 हिजरी अर्थात 1492 ई. के आसपास हुआ। इनका जन्म स्थान जिला रायबरेली में जायस नगर था।

 

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