दिव्यांग है तो दिव्यांगता प्रमाणित कीजिए ?

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांगता प्रमाणपत्र के मामले में धारा 56, 57, 58 और 59, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की प्रमुख धाराएँ हैं। आपराधिक आरोप के लिए घटना की तारीख के अनुसार भारतीय न्याय संहिता, 2023 या पुराने कानून की प्रयोज्यता अलग से देखनी होगी। इसलिए नीचे प्रश्नों को “आरोप सिद्ध” करने के बजाय “आरोप की जाँच और प्रमाण स्थापित करने” के रूप में रखा गया है

पहला भाग – चिकित्सा मंडल के अधिकार और गठन: क्या आप उस दिन विधिवत गठित चिकित्सा मंडल के सदस्य थे? आपका नामांकन किस आदेश से हुआ? आदेश की प्रति कहाँ है? आपकी चिकित्सकीय विशेषज्ञता क्या है? क्या उस दिन आपकी ड्यूटी निर्धारित थी? क्या उपस्थिति-पंजी में आपका हस्ताक्षर है? मंडल में कितने सदस्य थे? क्या सभी सदस्य उपस्थित थे? बैठक का समय क्या था? क्या कार्यवाही-पंजी बनाई गई? क्या आपने उस पर हस्ताक्षर किए? क्या आपको प्रमाणन प्राधिकारी के रूप में अधिकृत किया गया था? क्या आपका अधिकार उस तारीख को प्रभावी था? क्या किसी सदस्य की अनुपस्थिति में आपने उसकी ओर से कोई कार्य किया? क्या ऐसा करने की अनुमति थी? क्या चिकित्सा मंडल की संरचना संबंधित नियमों के अनुरूप थी? यदि नहीं, तो किस अधिकारी से अनुमति ली गई? उसका लिखित प्रमाण कहाँ है? दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 57 के अंतर्गत प्रमाणन प्राधिकारी की वैधानिक स्थिति क्या थी?

दूसरा भाग—आवेदक की पहचान और आवेदन: क्या आपने आवेदक का मूल आवेदन देखा? आवेदन कब प्राप्त हुआ? आवेदन संख्या क्या थी? क्या आवेदन में दी गई दिव्यांगता संबंधी जानकारी आपने पढ़ी? क्या पहचान दस्तावेज का सत्यापन किया? क्या चिकित्सकीय पुराने अभिलेख देखे? क्या आवेदक को कोई दस्तावेज लाने के लिए कहा गया? क्या उसकी सूचना लिखित रूप में दी गई? क्या कोई दस्तावेज अनुपलब्ध था? यदि था तो उसका उल्लेख अभिलेख में है? क्या आवेदन को अस्वीकार करने या रोकने का कोई लिखित कारण था? क्या आवेदक को उस कारण की सूचना दी गई?

तीसरा भाग—वास्तविक चिकित्सकीय परीक्षण: क्या आपने आवेदक को स्वयं देखा? आपने कितने समय तक परीक्षण किया? आपने कौन-कौन से परीक्षण किए? प्रत्येक परीक्षण का परिणाम क्या था? क्या परिणाम लिखित रूप से दर्ज किया गया? किस चिकित्सक ने दर्ज किया? क्या आपने दर्ज परिणाम की पुष्टि की? क्या कोई उपकरण इस्तेमाल किया गया? क्या वह उपयुक्त और कार्यशील था? क्या परीक्षण की तिथि और समय दर्ज है? क्या किसी विशेषज्ञ ने परीक्षण किया? क्या विशेषज्ञ की राय ली गई? यदि नहीं ली गई तो क्यों? क्या पुराने चिकित्सकीय अभिलेखों और वर्तमान परीक्षण के बीच तुलना की गई? क्या किसी आवश्यक परीक्षण को छोड़ा गया? यदि छोड़ा गया तो उसका कारण क्या था?

चौथा भाग—दिव्यांगता प्रतिशत: आपने प्रतिशत किस अधिसूचित मूल्यांकन दिशानिर्देश के अनुसार निर्धारित किया? उस दिशानिर्देश का कौन-सा प्रावधान लागू था? क्या आपने उसकी प्रति देखी थी? क्या आपने निर्धारित पद्धति के सभी चरण पूरे किए? कौन-कौन से चिकित्सकीय निष्कर्ष प्रतिशत निर्धारण का आधार बने? गणना किसने की? गणना-पत्र कहाँ है? क्या प्रतिशत सीधे अनुमान से निर्धारित किया गया या निर्धारित सूत्र/पद्धति से? गणना किस तारीख को हुई? क्या गणना की स्वतंत्र जाँच हुई? क्या तीनों चिकित्सक उससे सहमत थे? सहमति का अभिलेख कहाँ है? यदि किसी सदस्य ने असहमति जताई तो वह कहाँ दर्ज है? धारा 56 के अंतर्गत लागू मूल्यांकन दिशानिर्देश का पालन कैसे किया गया?

पाँचवाँ भाग—कम प्रतिशत दिए जाने का प्रश्न: यदि आवेदक की शिकायत है कि प्रतिशत कम दिया गया, तो पूछें—आपके निष्कर्ष में कौन-कौन से चिकित्सकीय तथ्य थे? उन तथ्यों का अभिलेख कहाँ है? यदि कोई विशेष चिकित्सकीय कमी बताई गई तो उसका परीक्षण कैसे हुआ? क्या उसी आधार पर प्रतिशत घटाया गया? प्रतिशत घटाने का निर्धारित मानदंड क्या था? गणना-पत्र कहाँ है? क्या किसी विशेषज्ञ की राय ने प्रतिशत को प्रभावित किया? क्या आपने वैकल्पिक चिकित्सकीय निष्कर्षों पर विचार किया? क्या आवेदक को निर्णय का कारण बताया गया? क्या निर्णय की प्रति दी गई? क्या पुनर्मूल्यांकन या अपील का रास्ता बताया गया? धारा 58 और धारा 59 के अनुसार निर्धारित प्रक्रिया का पालन कैसे हुआ?

छठा भाग—तीनों डॉक्टरों के हस्ताक्षर: क्या प्रमाणपत्र पर आपका हस्ताक्षर है? क्या आपने हस्ताक्षर करने से पहले पूरा अभिलेख पढ़ा? क्या आपने स्वयं परीक्षण किया? आपने कौन-सा परीक्षण किया? उसका परिणाम क्या था? वह परिणाम किस पृष्ठ पर है? क्या आपने प्रतिशत की गणना देखी? क्या आप गणना से सहमत थे? आपकी सहमति कहाँ दर्ज है? क्या आपने कोई आपत्ति की? यदि नहीं, तो क्या आपका हस्ताक्षर प्रमाणपत्र में दर्ज चिकित्सकीय निष्कर्षों की पुष्टि करता है? यही प्रश्न दूसरे और तीसरे चिकित्सक से अलग-अलग पूछे जाएँ। फिर तीनों के उत्तर मूल अभिलेख से मिलाए जाएँ।

सातवाँ भाग—सरकारी अभिलेख: क्या मूल मेडिकल फाइल उपलब्ध है? क्या मूल मूल्यांकन-पत्र उपलब्ध है? क्या मूल गणना-पत्र उपलब्ध है? क्या उपस्थिति-पंजी उपलब्ध है? क्या मंडल गठन आदेश उपलब्ध है? क्या विशेषज्ञ की रिपोर्ट उपलब्ध है? क्या मूल प्रमाणपत्र उपलब्ध है? क्या यूडीआईडी आवेदन का अभिलेख उपलब्ध है? क्या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में किसी अधिकारी ने परिवर्तन किया? परिवर्तन कब हुआ? किसने किया? क्या उसका अभिलेख उपलब्ध है? क्या प्रमाणपत्र में दर्ज जानकारी मूल चिकित्सकीय अभिलेख से मेल खाती है? यदि नहीं, तो अंतर क्यों है?

आठवाँ भाग—जानबूझकर गलत सरकारी अभिलेख की आशंका: क्या आपने कोई ऐसा तथ्य दर्ज किया जिसे आपने स्वयं सत्यापित नहीं किया? क्या किसी दूसरे कर्मचारी ने आपके नाम से कोई प्रविष्टि की? क्या आपने किसी अन्य व्यक्ति के लिखे निष्कर्ष पर हस्ताक्षर किए? क्या आपने बिना परीक्षण के किसी निष्कर्ष को स्वीकार किया? क्या प्रमाणपत्र में कोई सुधार किया गया? किसने किया? सुधार के नीचे किसका हस्ताक्षर है? क्या सुधार की अनुमति थी? क्या मूल प्रविष्टि सुरक्षित है? क्या कोई पृष्ठ बदला गया? क्या कोई पृष्ठ गायब है? क्या किसी प्रविष्टि की तारीख बाद में बदली गई?

यदि जानबूझकर झूठा दस्तावेज, जालसाजी या सरकारी अभिलेख में कूटरचना का ठोस साक्ष्य सामने आता है, तभी घटना के तथ्यों के अनुसार भारतीय न्याय संहिता, 2023 की संबंधित धाराएँ—जैसे धारा 335 (झूठा दस्तावेज/इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख), धारा 336 (जालसाजी), धारा 337 (न्यायालयीय या सरकारी अभिलेख/प्रमाणपत्र आदि की जालसाजी)—की प्रयोज्यता पर विचार किया जा सकता है। केवल किसी रिकॉर्ड में गलती मिल जाना इन धाराओं के अपराध को स्वतः सिद्ध नहीं करता।

नौवाँ भाग—अनुचित धनराशि या रिश्वत: क्या प्रमाणपत्र बनाने के लिए कोई धनराशि माँगी गई? किसने माँगी? किस तारीख को? किस उद्देश्य से? क्या सरकारी शुल्क निर्धारित था? शुल्क की आधिकारिक सूची कहाँ है? क्या भुगतान की सरकारी रसीद दी गई? पैसा किसे दिया गया? क्या पैसा सरकारी खाते में गया? क्या किसी कर्मचारी ने कहा कि पैसा देने पर प्रतिशत बढ़ जाएगा? क्या कोई संदेश, ध्वनि-रिकॉर्ड, गवाह या बैंक लेनदेन उपलब्ध है? क्या डॉक्टर ने स्वयं पैसा माँगा या किसी मध्यस्थ के माध्यम से? यदि लोक सेवक द्वारा अनुचित लाभ माँगने या स्वीकार करने का प्रमाण हो, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 की प्रयोज्यता जाँची जा सकती है; अन्य संबंधित धाराएँ भी घटना के वास्तविक तथ्यों पर निर्भर करेंगी।

दसवाँ भाग—समानता और मौलिक अधिकार: क्या समान स्थिति वाले सभी आवेदकों पर एक ही मूल्यांकन पद्धति लागू की गई? यदि इस आवेदक के साथ अलग प्रक्रिया अपनाई गई तो उसका चिकित्सकीय कारण क्या है? क्या उस अंतर का कोई लिखित आधार है? क्या बिना कारण किसी आवेदक को बार-बार बुलाया गया? क्या निर्णय देने में असामान्य विलंब हुआ? क्या निर्णय का कारण बताया गया? ऐसे तथ्य सामने आने पर संविधान का अनुच्छेद 14 समानता और मनमानी सरकारी कार्रवाई के प्रश्न से तथा अनुच्छेद 21 गरिमा और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के प्रश्न से जोड़ा जा सकता है। लेकिन इन अनुच्छेदों के आधार पर डॉक्टर को स्वतः अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता।

ग्यारहवाँ भाग—स्वास्थ्य और गरिमा: क्या आपने आवेदक की चिकित्सकीय स्थिति का उचित मूल्यांकन किया? क्या आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण उपलब्ध कराया गया? क्या आवश्यक विशेषज्ञ तक पहुँच दी गई? क्या परीक्षण के दौरान सम्मानजनक व्यवहार किया गया? क्या किसी दिव्यांग व्यक्ति को उसकी दिव्यांगता के कारण अपमानित या अनावश्यक रूप से परेशान किया गया? क्या चिकित्सा व्यवस्था ने उसके अधिकारों की रक्षा की? यहाँ दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की धारा 3 में समानता और भेदभाव-रहित व्यवहार तथा अधिनियम के अन्य लागू अधिकारों को मामले के तथ्यों के अनुसार देखा जा सकता है।

बारहवाँ भाग—अंतिम जवाबदेही: क्या आप न्यायालय के सामने यह दस्तावेज प्रस्तुत कर सकते हैं कि आपने लागू मूल्यांकन दिशानिर्देश का पालन किया? क्या आप प्रत्येक परीक्षण का परिणाम दिखा सकते हैं? क्या आप प्रतिशत की गणना दिखा सकते हैं? क्या आप तीनों चिकित्सकों की सहमति दिखा सकते हैं? क्या आप प्रमाणपत्र पर अपने हस्ताक्षर का आधार बता सकते हैं? क्या मूल अभिलेख में कोई ऐसा तथ्य है जो आपके अंतिम निष्कर्ष से मेल नहीं खाता? यदि सभी आवश्यक अभिलेख उपलब्ध हैं, तो उन्हें प्रस्तुत करने में आपको कोई आपत्ति है? यदि कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है, तो उसके उपलब्ध न होने का कारण क्या है?

सबसे निर्णायक प्रश्न: “क्या आप न्यायालय के समक्ष यह स्वीकार करते हैं कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र में दर्ज प्रतिशत निर्धारित करने से पहले लागू सरकारी मूल्यांकन दिशानिर्देश, वास्तविक चिकित्सकीय परीक्षण, संबंधित चिकित्सकीय निष्कर्ष और निर्धारित गणना-पद्धति का पालन करना आवश्यक था; यदि आपने इन सभी चरणों का पालन किया है तो प्रत्येक चरण का मूल अभिलेख न्यायालय के सामने प्रस्तुत कीजिए; यदि किसी चरण का अभिलेख उपलब्ध नहीं है तो उसका कारण बताइए; यदि आपके और अन्य चिकित्सकों के कथन मूल अभिलेख से अलग हैं तो उस अंतर का कारण बताइए; और यदि प्रमाणपत्र जारी करने अथवा प्रतिशत निर्धारित करने के बदले किसी अनुचित लाभ की मांग या प्राप्ति हुई है तो उसके संबंध में उपलब्ध सरकारी और स्वतंत्र साक्ष्य न्यायालय के सामने प्रस्तुत कीजिए।”

 

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