सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार :देेश की रक्षा के लिए जान देने का किया जाए। इसमें कहा गया है कि अगर कैडेट डिसएबल हो जाता दिया जाए। साथ ही प्रस्ताव में कहा गया है कि कैडेट्स के लिए भी जज्बा लेकर युवा फौज में ऑफिसर बनने पहुंचते हैं। चार साल की है या मौत हो जाती है तो आर्थिक मदद (एक्स ग्रेशिया) का प्रावधान एजीआईएफ (आर्मी ग्रुप इश्योरेंस फंड) को लागू किया जाए। देश कड़ी मेहनत के बाद वह अकेडमी से निकलकर भारतीय सेना, नेवी किया जाए। इसके लिए उन्हें लेफ्टिनेंट की सैलरी के हिसाब से पेंशन सेवा के लिए आगे आने वाले कैडेट्स का यह मसला लंबे वक्त से या एयरफोर्स का हिस्सा बनते हैं। लेकिन ट्रेनिंग के दौरान चल रहा है।भारतीय आर्ड फोर्सेस (सेना, नेवी, एयरफोर्स) अगर उन्हें गंभीर चोट लगी और डिसएबल हो गए तो सेना का हिस्सा बनने से पहले युवा जब तक एनडीए, आईएमए, उन्हें बाहर कर देती है। ऐसे युवाओं का न सिर्फ सपना टूटता ओटीए या नेवी और एयरफोर्स की अकेडमी में ट्रेनिंग कर है बल्कि हौसला भी क्योंकि फिर सेना की तरफ से उनसे पूरी रहे होते हैं तब तक उन्हें कैडेट्स कहा जाता है। वह जब तरह मुंह मोड़ लिया जाता है। न कोई आर्थिक मदद और न ट्रेनिंग पूरी कर फौज में कमिशन होते हैं तब से उन्हें फौज ही इलाज में कोई सहायता। अब भारतीय सशस्त्र सेनाओं का हिस्सा माना जाता है। लेकिन अगर ट्रेनिंग के दौरान कोई (आर्मी, नेवी और एयरफोर्स) ने दिव्यांग (डिसएबल) कैडेट डिसएबल हुआ या उसकी मौत हो गई तो सरकार या कैडेट्स को आर्थिक मदद और इलाज में मदद देने का फौज की तरफसे उन्हें या परिवार वालों को कोई राहत नहीं प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजा है। सूत्रों के मुताबिक जो दी जाती। सेना के एक अधिकारी ने कहा कि दिव्यांग प्रस्ताव दिया है वह अभी रक्षा मंत्रालय के एक्स सर्विसमैन कैडेट्स को मदद देने का मसला संवेदनाओं से भी जुड़ा है।वेलफेयर डिपार्टमेंट और फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास है।जब कोई युवा सेना का हिस्सा बनने आता है तो वह खुद उम्मीद जताई जा रही है कि इस पर जल्दी ही फैसला होगा। क्योंकि दी जा सकती है। अभी भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट की सैलरी 56510 को पूरी तरह देश को समर्पित करता है और अगर उसे कुछ हो गया 2015 में रक्षा मंत्री ने इस मामले पर एक्सपर्ट कमिटी बनाई थी तब रुपए है। पेंशन इसकी आधी होती है। कैंडेड्स सेना में लेफ्टिनेंट के तो उससे मुंह मोड़ लेना बिल्कुल सही नहीं है। ट्रेनिंग के दौरान भी कमिटी ने दिव्यांग कैडेट्स को डिसएबिलिटी पेंशन और आर्थिक तौर पर ही कमिशन होते हैं डिसएबल होने के बाद कइयों को जिंदगी भर इलाज का भारी खर्चा
मदद की सिफारिश की थी। लेकिन तब इसे स्वीकार नहीं किया प्रस्ताव में कहा गया है कि दिव्यांग कैडेट्स को पूर्व सैनिकों की उठाना पड़ता है। ऐसे में अगर उन्हें ईसीएचएस में शामिल किया जाए गया। अब फिर सेनाएं इसकी कोशिश कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक तरह हेल्थ स्कीम ईसीएचएस में शामिल किया जाए। यह हेल्थ तो उन्हें कुछ राहत मिल सकती है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक 1985 जो प्रस्ताव दिया गया है उसमें कहा गया है कि आर्मी के पेंशन स्कीम कॉन्ट्रिब्यूटरी स्कीम है यानी सैनिक की सैलरी से इसके लिए के बाद अब तक करीब 450 डिसएबल कैडेट्स हैं। हर साल अलग रेगुलेशन में कैडेट्स को भी शामिल किया जाए। साथ ही एक तय अमाउंट कटता है। प्रस्ताव में कहा गया है कि दिव्यांग अलग सैन्य अकेडमी में करीब 8-10 कैडेट्स मेडिकली अनफिट डिसएबिलिटी पेंशन और फैमिली पेंशन रेगुलेशन में भी बदलाव कैडेट्स के लिए इस स्कीम में सरकार की तरफसे आर्थिक योगदान होने की वजह से बाहर हो जाते हैं।
