दिव्यांग न्यायालय कहाँ है? दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 लागू है, फिर न्याय में देरी क्यों?

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : दिव्यांग शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है दिव्यांगत दिव्यांग यूनिक डिसेबिलिटी बनाने पर कैपिटल शब्द का इस्तेमाल होता है फांसी और ‘कलम तोड़ना’ देसी भाषा में जिक्र किया जाता है कि पहले फांसी की सजा सुनाने के बाद जज अपनी कलम तोड़ देते थे, ताकि उस कलम से दोबारा किसी अन्य व्यक्ति का फैसला न लिखा जा सके इसे अंग्रेजी में ‘कैपिटल पनिशमेंट’ कहा जाता है। मरे हुए या मृत व्यक्ति का नाम कैपिटल लेटर्स में लिखा जाता है जब भी बैंक में खाता खुलवाना हो, स्कूल में प्रवेश लेना हो, नौकरी के लिए आवेदन करना हो, या जन्म प्रमाण पत्र बनवाना हो, तो विशेष रूप से हिदायत दी जाती है कि नाम ‘कैपिटल लेटर्स’ (बड़े अक्षरों) में लिखा जाए आपके हस्ताक्षर कभी भी कैपिटल लेटर्स में नहीं होते, लेकिन हस्ताक्षर के ठीक नीचे आपका नाम कैपिटल अक्षरों में लिखा जाता है ताकि यह दर्शाया जा सके कि यह हस्ताक्षर उस ‘मरे हुए व्यक्ति’ के हैं प्रौढ़ शिक्षा पर सवाल/फ्रॉड का दावा बातचीत के अंत में वक्ता इसे कोई सामान्य लॉजिक न मानकर ‘वास्तविकता’ बताता है और यह आरोप लगाता है कि प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा बहुत बड़ा फ्रॉड किया गया था जब बिहार की धरती पर चौवन लाख दिव्यांगों की उम्मीदें न्याय की आस में कराह रही हों, तो उनकी पुकार सुनने वाला मसीहा एक ऐसा ‘अतिरिक्त प्रभार’ वाला न्यायाधीश है, जिसके कंधों पर पहले से ही कई कुर्सियों का बोझ है। जो खुलेआम यह फरमान सुनाता हो कि “मुझे जबरदस्ती यह जिम्मेदारी थमाई गई है, मेरे पास फुर्सत नहीं है और मैं इस अदालत की चौखट पर बैठने से रहा!” वाह रे न्याय व्यवस्था! जहाँ कागजों पर तो हक का पहरा है, पर हकीकत में विकलांगों की किस्मत को एक ऐसे बेपरवाह बाबू के रहम-ओ-करम पर छोड़ दिया गया है, जिसकी जुबान से खुद उसकी बेबसी नहीं बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता चीख-चीख कर कह रही हो कि यहाँ न्याय खुद ही एक अपाहिज बन कर दम तोड़ चुका है भारत की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, देश में मुकदमा दायर करने की तो पूरी आज़ादी है, लेकिन न्याय पाने की नहीं, क्योंकि निचली अदालतों के फैसलों को उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पलटे जाने का सिलसिला चलता रहता है और जमीन जैसे मामलों में तो पीढ़ियां बीत जाने के बावजूद फैसले नहीं आते। वर्तमान में भारतीय अदालतों में करीब साढ़े चार करोड़ मुकदमे पेंडिंग हैं और न्याय मिलने का औसत समय पैसे होने पर 10 साल जबकि पैसे न होने पर अनिश्चित है। वैश्विक सूचकांकों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 143 देशों में हमारी न्याय व्यवस्था 88वें नंबर पर, भ्रष्टाचार के मामले में 96वें नंबर पर और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में 62वें नंबर पर है। इसके अलावा, हाईकोर्ट के फैसलों को रईसों द्वारा सौ फीसदी चुनौती दिए जाने, जजों के चयन की प्रक्रिया (जज ही जज चुनते हैं), स्टाफ द्वारा पैसे लेकर तारीखें दिए जाने, और जजों के यहां से जला हुआ नोट मिलने जैसी शर्मनाक कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट’ (न्यायालय की अवमानना अधिनियम) के सेक्शन 16 में यह कानूनी व्यवस्था दी गई है कि यदि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या जिला न्यायालय का कोई भी जज न्यायालय की अवमानना करता है या संस्था की बदनामी करता है, तो इसी अधिनियम के सेक्शन 16 के तहत सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला न्यायालय के उन जजों को भी 6 महीने की जेल की सजा भेजी जा सकती है जनता की उस गलतफहमी को दूर करने का प्रयास किया है जिसमें लोग विधायक  सांसद या मंत्री और विधानसभा-लोकसभा को ‘सरकार’ यानी ‘मालिक’ समझ लेते हैं। वक्ता का तर्क है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, जज, डीसी, एसडीएम और तहसीलदार समेत सभी जनप्रतिनिधि और अधिकारी जनता के टैक्स के पैसों से तनख्वाह लेते हैं, और तनख्वाह लेने वाला व्यक्ति ‘नौकर’ होता है जबकि तनख्वाह देने वाली जनता ही असली ‘मालिक’ यानी ‘भारत सरकार’ है। लेकिन विडंबना यह है कि आज देश का असली मालिक (जनता) ही अपनी इस वास्तविक स्थिति को भूलकर इन नौकरों (नेताओं और अधिकारियों) को अपना ‘माई-बाप’ समझ बैठा है और उनके सामने पेंशन, आयुष्मान कार्ड, बीपीएल कार्ड या तारीख जैसी सुविधाओं के लिए हाथ फैलाकर भीख मांगने जैसी स्थिति में जीने को मजबूर है।

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