“दिव्यांग “कागज पर अधिकार, जमीन पर इंतजार”

सर्वप्रथम न्यूज सौरभ कुमार : तीन डिसमिल जमीन में दिव्यांग कहाँ हैं?2011 में गरीब, 2026 में क्या अरबपति हो गए? समाज आगे बढ़ता गया, लेकिन भूमिहीन दिव्यांगों के लिए सवाल आज भी वहीं खड़ा है क्या उनके पास रहने और रोजगार करने के लिए जमीन नहीं होनी चाहिए? बिहार की सरकारी भूमि नीति के उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि भूमिहीन परिवारों के लिए पहले 3 डिसमिल और 2015 की नीति में 5 डिसमिल आवासीय भूमि का प्रावधान किया गया था। वहीं दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 सरकारों पर दिव्यांगजनों को दूसरों के समान अधिकारों का आनंद दिलाने के लिए प्रभावी उपाय करने की जिम्मेदारी डालता है। ऐसे में आज यदि किसी भूमिहीन दिव्यांग को आवेदन करने वाली व्यवस्था में अपनी दिव्यांगता दर्ज कराने का स्पष्ट विकल्प ही नहीं मिलता, तो सबसे बड़ा सवाल यही है वह अपने अधिकार का दावा करेगा तो करेगा कैसे? ₹1,100 जैसी मासिक सामाजिक सुरक्षा राशि में किसी व्यक्ति को पूरे महीने भोजन, दवा, कपड़ा और अन्य जरूरतें पूरी करने की चुनौती हो सकती है; ऐसे व्यक्ति से यह मान लेना कि उसके पास अब जमीन और रोजगार के पर्याप्त साधन हैं, वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। जिस परिवार के पास रहने के लिए जमीन नहीं, उसके लिए तीन डिसमिल केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि छत, सम्मान और आत्मनिर्भरता की संभावना है। और यदि पहले 5 डिसमिल की नीति का लाभ किसी पात्र दिव्यांग तक नहीं पहुंचा, फिर नई 3 डिसमिल व्यवस्था में भी दिव्यांगों की स्पष्ट पहचान या प्राथमिकता नहीं है, तो सरकार को जवाब देना चाहिए कि भूमिहीन दिव्यांग आखिर जाए तो जाए कहाँ? क्या दिव्यांग होना केवल प्रमाणपत्र पर लिखा शब्द रह जाएगा, जबकि जमीन, घर और रोजगार के अवसरों में उसकी पहचान दिखाई ही नहीं देगी? बिहार सरकार को तत्काल स्पष्ट करना चाहिए कि भूमिहीन दिव्यांगों की पात्रता क्या है, कितने दिव्यांग परिवारों को भूमि मिली है और आवेदन-पत्र में दिव्यांगों के लिए अलग प्रावधान क्यों नहीं है। क्योंकि अधिकार तभी अधिकार कहलाता है, जब वह कागज से निकलकर उस व्यक्ति की जिंदगी तक पहुंचे जिसके नाम पर वह लिखा गया है बिहार में सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में दिव्यांगजनों को ₹1100 प्रतिमाह दिए जाने की सरकारी पुष्टि है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के सामने भोजन, दवा, आवागमन, कपड़े और जीवन की दूसरी मूलभूत आवश्यकताओं का खर्च हो, तो सवाल केवल ₹1100 का नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार का बन जाता है।  भारत का संविधान समानता और गरिमा का सिद्धांत रखता है और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 सरकारों पर यह जिम्मेदारी डालता है कि दिव्यांगजन दूसरों के समान अपने अधिकारों का आनंद ले सकें; इसी कानून में सरकारी नौकरियों में बेंचमार्क दिव्यांगजनों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण तथा सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय सहायता की व्यवस्था भी की गई है।  ऐसे में यदि सरकारी व्यवस्था रोस्टर बनाते समय समाज के प्रत्येक वर्ग को ध्यान में रखती है, तो यह गंभीर संवैधानिक प्रश्न है कि दिव्यांग नागरिकों की वास्तविक भागीदारी, रोजगार और प्रतिनिधित्व को पर्याप्त रूप से कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है? जिम्मेदारी किसी एक अधिकारी पर आरोप लगाने से पहले संबंधित विभाग, रोस्टर तैयार करने वाली व्यवस्था और सरकार द्वारा अधिनियम के क्रियान्वयन की पारदर्शी समीक्षा से तय होनी चाहिए। सबसे पीड़ादायक प्रश्न यह भी है कि जिस शब्द को सम्मान देने के लिए “दिव्यांग” कहा गया, कहीं व्यवस्था की उदासीनता ने उसे सरकारी कागजों में ही सीमित तो नहीं कर दिया? दिव्यांग होना अधिकारों से वंचित होना नहीं है; और यदि अधिकार कानून में लिखे हों लेकिन जीवन में दिखाई न दें, तो लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि कानून की रोशनी जमीन तक क्यों नहीं पहुंची? समय के साथ जब समाज के विभिन्न वर्गों के लिए योजनाओं, संरक्षण और अवसरों का विस्तार होता है, तब सबसे अधिक आवश्यकता उन नागरिकों पर ध्यान देने की होती है जो सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक बाधाओं के कारण समान अवसर प्राप्त करने में पीछे रह जाते हैं। भारतीय संविधान ने समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को आधार बनाया है तथा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने दिव्यांगजनों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया है। ऐसे में यदि किसी दिव्यांग नागरिक को कानून में लिखे अधिकार, आरक्षण, संरक्षण अथवा समान अवसर से वास्तविक जीवन में वंचित रहना पड़े, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन और संवैधानिक न्याय की गंभीर परीक्षा है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि दिव्यांगजन को कितना दिया जा रहा है, बल्कि यह होना चाहिए कि कानून ने जो अधिकार सुनिश्चित किए हैं, क्या वे अंतिम व्यक्ति तक पूरी ईमानदारी से पहुंच रहे हैं? यदि संविधान और कानून समानता का वचन देते हैं, लेकिन व्यवस्था में कोई नागरिक अपने अधिकार के लिए वर्षों तक संघर्ष करता रहे, तो लोकतंत्र को स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि कानून की पुस्तक और जमीन पर दिखाई देने वाले न्याय के बीच इतनी दूरी क्यों है। दिव्यांगजन किसी दया के पात्र नहीं, बल्कि संविधान और कानून द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकारों के धारक हैं; इसलिए उनके अधिकारों की अनदेखी को सामान्य प्रशासनिक कमी मानकर छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके कारण, जिम्मेदारी और समाधान पर गंभीर सार्वजनिक विमर्श करना आवश्यक है।

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