दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए शिक्षा और टेक्नोलॉजी

सर्वप्रथम न्यूज़ सौरभ कुमार : भारत में समग्र शिक्षा में जबरदस्त बदलाव देखने को मिला है। इसके बावजद, देश को दृष्टि दिव्यांगजन और देखने
में सक्षम बच्चों को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए अभी लंबा सफर तय करना बाकी है
यह लेख दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए शिक्षा के ऐतिहासिक परिदश्य और तकनीकी आविष्कारों के इस्तेमाल के
साथ आगे बढ़ने पर प्रकाश डालता है।
त 1950 के शुरुआती करीब दो दशक बाद, ऐसी ही हालत लड़का पहले से ही जवाब देने के लिए तैयार
दिनों की है जब एक दृष्टि में एक अन्य लड़का दिल्ली विश्वविद्यालय था, उसने कहा, “सर, यहां तक कि स्कूल
दिव्यांगजन लड़के ने दाखिले के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में स्नातक पाठयक्रम में भी हमारी कक्षा पहली मजिल पर था।”
के लिए स्कूल के प्रिंसिपल से मुलाकात में दाखिला लेने के लिए गया। जन 1970 प्रिंसिपल ने उत्तर दिया, “ठीक है, मुझ तुम्हार
की। प्रिसिपल ने यह कहते हुए इंकार कर में उस दिन बेहद गर्मी थी। उसे विश्वास मामले में दाखिले के लिए विश्वविद्यालय के
दिया, “मैं तुम्हें कैसे दाखिला दे सकता हूँ?” था कि उसके नम्बरों और उसकी तैयारी अधिकारियों के साथ सलाह करनी होगी।”
हमारा पढ़ाई का माहौल खराब हो जाएगा के आधार पर उसे दाखिला मिल जाएगा। उस भले मानस के सामने एक टाइप
क्योंकि छात्र तुम्हारे आसपास घूमेंगे; हंसेंगे चौड़ी मेज के दूसरी तरफ बैठे प्रिंसिपल ने किया हुआ पन्ना रखते हुए, लड़के ने
और तुम्हारा मजाक उड़ाएंगे!”
कहा, “हमारी कक्षाएं पहली मंजिल पर हैं।” विश्वास के साथ कहा, “सर, यहां देखिए.
लोकन/अग्रेजी चर्च की सदस्य) सुनी ऐनी शाप 11887 म अमृतसर में दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए सख-सुविधाओं की शरुआत करने में सहायता की।
1.एक एगलाकन (अप्रजाप
लेफ्टिनेंट कर्नल सर क्लरथा मैकेन्जीको प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दृष्टि दिव्यागजन हुए भारतीयों के पुनर्वास के लिए 1942 में ओएसडी नियत कियादृष्टि दिव्यांगजनों के लिए शिक्षा संबंधी सेवाओं का घटनाक्रम
संस्थान के रूप में फली-फूली। धीरे-धीरे,
ऐसे संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ती रही।
1887- अमृतसर में दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए सुख-सुविधाओं की शुरुआत की गई: |
सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार 1944
1944- लेफ्टिनेंट कर्नल सर क्लूरथा मैकेन्जों ने दृष्टि दिव्यांगता पर भारत सरकार की
तक अविभाजित भारत में इनकी संख्या 32
रिपोर्ट लिखने में प्रमुख भूमिका निभाई।
तक हो गई। इनमें से कुछ को शैक्षणिक
1947- शिक्षा मंत्रालय (एमओई) में दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए एक इकाई की संस्थान माना जा सकता है। अन्य को बेघरों
स्थापना की गई।
के लिए मध्ययुगीन शरणस्थल से लेकर
1951- भारत ने विभिन्न भाषाओं के लिए समान बेल कोड स्वीकार किया
पनाहगाह की श्रेणी में रखा जा सकता है।
1952- भारत में पहला ब्रेल प्रिटिंग संयंत्र देहरादून में स्थापित किया गया।
इस युग की प्रमुख विशेषताएं थीं:
1954-ब्रेल उपकरण बनाने की इकाई की स्थापना की गई।
1. संस्थान केवल प्राइमरी स्तर तक
1959- सरकार ने देहरादून में दृष्टि दिव्यांगजन बच्चों के लिए अपना पहला मॉडल
सीमित थे
स्कूल स्थापित किया
2. एक अखिल भारतीय ब्रेल कोड की |
1960- दृष्टि दिव्यांगजनों के अध्यापकों के लिए चार क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित किए गए।
कमी थी.
1974- सरकार ने दिव्यांग बच्चों के लिए समेकित शिक्षा शुरू की (आईईडीसी);
3. बेल बिन्दु आधारित स्पर्श संबंधी पदन-
1981- अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग वर्ष मनाया गया (आईवाईडीपी);
लिखने की प्रणाली है जिसका इस्तेमाल
1983-92- दिव्यांगों के लिए संयुक्त राष्ट्र दशक, और
दृष्टि दिव्यांगजन करते हैं.
2016-दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार कानून (आरडीपी) बनाया गया।
4. देश में बेल प्रिंटिंग इकाई का नहीं होना
5. दृष्टि दिव्यांगजन के लिए आवायन
“स्टर-यूनिवर्सिटी बोर्ड ने अपनी 33वीं बैठक में, दृष्टि दिव्यांगजनों को शिक्षित करने के साधारण उपकरण को उत्पादन सुविधा
में फैसला किया है कि दृष्टि दिव्यांगजनों को लिए अनेक प्रयास किए गए। अत: हम दृष्टि
का नहीं होगा।
उनकी योग्यता के आधार पर अन्य सुविधाओं दिव्यांगजनों के लिए शिक्षा संबंधी सेवाओं
वर्ष 1947 पूरे देश के लिए और
के साथ सभी कॉलेजों में दाखिला दिया जा को तीन चरणों में विभाजित कर सकते हैं। संयोगवश दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए भी
सकता है।”
स्वाधीनता से पूर्व का युग, स्वाधीनता के बाद आमूल परिवर्तन काल था। 1947 में अप्रैल
लड़के की इस दलील को सुनकर का युग और 21वीं शताब्दी की शुरुआत के के महीने में शिक्षा मंत्रालय (एमआई)
प्रिसिपल नाराज हो गए और कहा, “तुम साथ आधुनिक युगा
दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए एक लघु शिक्षा
वकील की तरह बात करते हो!”
एक एंगलीकन, सुश्री ऐनी शार्प ने वर्ष और पुनर्वास इकाई की स्थापना की गई।
वह उदास और हतोत्साहित होकर गेट 1887 में दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए अमृतसर दृष्टि दिव्यांगजनों पर भारत सरकार की रिपट
से बाहर चला गया और फुटपाथ पर खड़ा में सुख-सुविधाओं की शुरुआत करने में 1944 में की गई सिफारिशों के अनुसार र
हो गया। संयोगवश, एक जवान व्यक्ति आया सहायता की। इसमें मोती के काम, बॅत के इकाई अस्तित्व में आई। लेफ्टिनेंट कर्नल सर
और उसने उसकी परेशानी पूछी। कारण पता काम का आधारभूत प्रशिक्षण और धर्मग्रंथों क्लूरथा मैकेन्जी ने प्रथम विश्व युद्ध के दृष्टि
चलने पर, उसने एक अन्य कॉलेज में जाने के का अध्ययन शामिल था ।
दिव्यांगजन सैनिक के रूप में अपने अनुभव
लिए उसका मार्गदर्शन किया और इंटरव्यू के हमदर्दी, दयालुता और कई बार सीमित के आधार पर इस रिपोर्ट को लिखने में प्रमुख
लिए उसका रोल नम्बर ढ निकाला। इंटरव्यू तरीके से दृष्टि दिव्यांगजनों को पढ़ाने के भूमिका निभाई। सरकार ने उन्हें चल रहे युद्ध
में उसका चयन हो गया और किरोड़ीमल लिए देश के विभिन्न भागों में काफी धीमी के दौरान युद्ध में आंखों की रोशनी खोने वाले
कॉलेज में दाखिला हो गया। जैसा कि कहा गति से ऐसे अन्य संस्थानों की स्थापना हुई। भारतीयों के पुनर्वास और विभिन्न श्रेणियों के
जाता है, बाकी सब इतिहास है। सुश्री जेन आस्किविद एक शिक्षाविद् थी, जो भारतीय दृष्टि दिव्यांगजनों की शिक्षा और
यह पूरी घटना मेरे दिमाग में जीवंत और दृष्टि दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने के उनके पुनर्वास के लिए एक रिपोर्ट देने के
तरोताज़ा है जैसे कल की बात हो! वह दयाल लिए उन्हें अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण देना लिए 1942 में ऑफिसर ऑन स्पेशल इयूटी
व्यक्ति जिसने मेरी मदद की थी वह बधिर चाहती थी। संस्थान की 1890 में शुरुआत के रूप में नियुक्त किया।
था जो अंततः मेरा मित्र बन गया।
स्तत: मरा मित्र बन गया। की गई और सुश्री आस्किविद ने लगातार सरकार ने भारतीयों और विभिन्न देश
यह सच है कि पिछली सहस्राब्दी के इसका विस्तार किया तथा तब तक इसमें में रह रहे अन्य दृष्टि दिव्यांगजनों के काम
हमारे इतिहास में कुछ विद्वानों जैसे सूरदास, सुधार किया जब तक वह इंग्लैंड नहीं चली के लिए ऐतिहासिक फैसला किया। उन्नात
गटू महाराज, स्वामी बिरजानंद, स्वामी गई। दूसरी तरफ, सश्री मिलार्ड ने सखे यूनेस्को से आग्रह किया कि कुछ सिमान
गंगेश्वरानंद आदि का नाम दर्ज है। लेकिन के दौरान कुछ गांवों से कुछ गरीब दृष्टि के आधार पर विश्व में बेल काड
वह अपने में एक नाम थे, अपने असाधारण दिव्यांगजनों को इकट्ठा किया और उनकी समानता के लिए काम को शुरू किया
बौद्धिक ओज, अपने विशिष्ट प्रयासों और देखभाल के लिए मुम्बई में एक संस्था को अंतर्राष्ट्रीय विचार-विमर्श के बाद. TH
दृढ़ता का नतीजा थे। 19वीं शताब्दी के अंत शुरुआत की। बाद में यह एक उम्दा शिक्षण ने विभिन्न भाषाओं में ब्रेल कोड  तैयार है६ को भी पाट दिया, हालांकि पहले अनेक और बच्चों को आकर्षित किया।
मामूला प्रयास किए गए थे। केन्द्रीय एमएचआरडी ने पीडब्ल्यूडी बच्चों की शिक्षा
हाष्ट दिव्यांगजनों के अध्यापकों को शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति, 1986 से प्रमुख
लिए के लिए 1960 में कार्यक्रम शुरू करने के नीति में शामिल करना शुरू किया।
स्थापना की पीडब्ल्यूडी की संयुक्त ताकत अपने
॥ गई। इस दशक में क्रमशः मुम्बई, दिल्ली, अधिकारों के प्रति सचेत हो गई. इस क्षेत्र में
कोलकाता और मद्रास में ऐसे केन्द्रों की खुद को दबाव समूहों में संगठित करने के
का प्रमुख स्थापना होते देखी गई। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम उनके प्रयास और इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र
स नाम के पहले गया और इसे कुछ बाहर के देशों में भारतीयों लागू करने के लिए और भारत की उत्सुकता
ने तेजी से प्रगति के लिए गति पैदा की।
के लिए सिद्धांतों को अंतिम रूप दे दिया। इस खाई को भी पाट ।
भारत ने 1951 में विभिन्न भाषाओं के लिए भी मामूली प्रयास किए गए
समान ब्रल कोड को स्वीकार कर लिया। योजना में दष्टि दिव्यांगजनों के अध्यापका
यह वास्तव में भविष्य की प्रगति के लिए के लिए 1960 में कार्यक्रम
अत्यधिक महत्व की ऐतिहासिक घटना थी। उद्देश्य से चार क्षेत्रीय केन्द्रा र
यह अकेला फैसला पूर्व में लिए गए किसी गई। इस दशक में क्रमशः मुम्बई ।
अन्य फैसले से अधिक महत्त्वपूर्ण था। कोलकाता और मद्रास म एस
समान ब्रेल कोड की कमी की प्रमुख स्थापना होते देखी गई। यह प्रशिक्षण कायक
समस्या से निपटने पर, सरकार ने 1952 में सीमित अवसरों से छोटे उपाय करने से बढ़ (यूएन) प्रस्तावों का स्वाकार
देहरादून में सेंट्रल ब्रेल प्रेस नाम के पहले गया और इसे कुछ बाहर के देशों में भार
ब्रेल प्रिटिंग संयंत्र की स्थापना की। सरकार को उपलब्ध कराया गया।”
ने इस दशक के बाद चार क्षेत्रीय ब्रेल प्रेसों वर्ष 1974 में दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा 12
सहायता प्रदान करना शुरू किया। आदर्श उपाय देखने को मिले जब भारत दिवस (आईवाईडीपी) के रूप में मनाने
जलप्रस के बाद 1954 में ब्रेल ने दिव्यांग बच्चों के लिए समेकित शिक्षा की घोषणा, दिव्यांगों के लिए 1983-92
उपकरण तैयार करने की इकाई स्थापित की (आईईडीसी) योजना की शुरुआत कर दी संयुक्त राष्ट्र दशक, अपने बाजिग बठ
गई ताकि बेल स्लेट और स्टाइल, अंकगणित जिसे सरकारी स्कलों के जरिये लाग किया 1992 में ईएससीएपी द्वारा दिव्यागा कालिए
बाड आर आवश्यक प्रकार, कुछ मनोरंजक जाना था। इस योजना के अंतर्गत विशेष एशियाई और प्रशांत दशक का घोषणा कुछ
पाप सुर तागा आर फोल्डिंग व्हाइट कैन अध्यापकों को वित्तीय सहायता, प्रत्येक छात्र उदाहरण है। आईवाईडीपी 1981 के बाद,
आदि जैसे साधारण उपकरण तैयार किए जा को उपकरण और शिक्षा संबंधी सामग्री प्रदान बड़ी संख्या में एनजीओ, स्वायत्तशासी संस्थान
सकाराष्ट दिव्यागजनों को प्रदान किए करने की व्यवस्था की गई। पहले दशक के और सरकारें अनेक कारणों से अत्यधिक
दौरान इस कार्यक्रम में धीमी प्रगति हुई। सक्रिय हो गई। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
समान ब्रेल कोड उपलब्धि होने के साथ तथापि, इन सभी उपायों और दिव्यांग और और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय आदि जैसे कुछ
ही, ब्रेल प्रेस और साधारण उपकरण हांलाकि किशोर बच्चों को छात्रवृत्तियां देने से उन्हें विश्वविद्यालयों ने विशेष शिक्षा पर कार्यक्रम
सीमित उपाय थे, उसी समय दृष्टि दिव्यांगजनों प्राइमरी, सैकेंडरी और उच्चस्तर पर पढ़ने का शुरू किए। न्यूनतम मानक सुनिश्चित करने
के लिए पंजीकृत होने वाले स्कूलों की संख्या अवसर प्रदान किया गया, निश्चित तौर पर, के लिए, सरकार ने भारतीय पुनर्वास परिषद
में तेजी से वृद्धि हुई। एनजीओ के अलावा, केवल थोड़ी सी संख्या में बच्चों को लाभ (आरसीआई) कानून, 1992 पास कर दिया।
सरकार ने दृष्टि दिव्यांगजन बच्चों के लिए मिल सकता था। बाद के दशकों में तेजी भारत ने 1992 में बीजिंग बैठक में किए गए
1959 में देहरादून में पहला मॉडल स्कूल से वृद्धि देखने को मिली।
फैसलों को अमल में लाने के लिए दिव्यांग
स्थापित किया। मांग को पूरा करने के लिए इस मामले को आसान बनाने के साथ व्यक्तियों के लिए (समान अवसर, अधिकारों
कुछ राज्य सरकारें भी आगे आई। अतः ही, शिक्षा पर मुख्य रूप से ध्यान केन्द्रित का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) कानून, 1995
1964 में ऐसे संस्थानों की संख्या 115 हो किया गया और किया जा रहा है। आईइंडीसी बनाया। इस कानून में स्पेशल (विशेष) और
गई। 1995 में यह बढ़कर 250 पर पहुंच योजना 1982 में शिक्षा मंत्रालय को हस्तांतरित सामान्य स्कूल तथा अनौपचारिक स्थान में
कर दी गई और एनसीईआरटी, नई दिल्ली में शिक्षा, अन्य सुविधाओं के साथ दिव्यांगों के
अब, शिक्षा के लिए जिस प्रमुख भाग एक प्रकोष्ठ स्थापित किया गया जिसे बाद में लिए अनुसंधान और संसाधनों की व्यवस्था
की कमी थी, वह थी इस क्षेत्र में अच्छे एक विभाग में बदल दिया गया। आईईडीसी की गई। वर्तमान माहौल को पहचानते हए.
अध्यापकों की। सरकार ने विशेष अध्यापकों योजना ने कुछ अन्य उपायों के साथ 1987 इस कानून में 18 वर्ष तक की आयु के दृष्टि
तैयार करने के लिए एक योजना शुरू कर और 1992 में अपने यहां परिवर्तन के बाद दिव्यांग बच्चों को मुफ्त और सार्वभौमिक हो चुकी थी।शिक्षा देने की इजाजत दी गई है। हालाकि ।
यह कानून दृष्टि दिव्यांगजनों के बीच ‘का
इसे ‘बिना अधिकार वाला’ कानून कहा गया, भारत केवल नवाचार और
रोशनी’ वाली एक अन्य श्रेणी प्रदान करता
फिर भी बड़े पैमाने पर चर्चित इस कानून ने सापकता में आपके बौद्धिक
लोगों को अधिकार सम्पन्न बनाया।
आईवाईडीपी 1981, पीडब्ल्यूडी और
योगदान के साथ आने वाले वा देखा है और काफी प्रगति देखने को मिली है।
ईएससीएपी घोषणापत्रों आदि के लिए संयुक्त
में वैश्विक नवाचार पर सही फिर भी, देश को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के क्षेत्र
राष्ट्र दशक ने भारत में शिक्षा के लिए उच्च प्रभाव डाल सकता है। भारत को में दृष्टि दिव्यांगता वाले और देखने में सक्षम
प्रोद्योगिकी वाली वस्तुओं सहित सहायक एक विकसित राष्ट्र में बदलने बच्चों के बीच समानता लाने के लिए काफी
प्रौद्योगिकी का आयात करने और उसे देश में में विज्ञान और प्रौद्योगिकी एक
का लंबा सफर तय करना है। दृष्टि दिव्यांगों और
विकसित करने को संभव बनाया। इनमें से महत्वपर्ण कारक होगा।
उनके परिवारों के लिए समानता निश्चित रूप
कुछ अत्यधिक महत्वपूर्ण वस्तुएं थी। इनमें
से जरूरी है लेकिन हमारे समाज को समावेशी
इंटरप्वाइंट स्लेट, मैकेनिकल राइटर, ऑडियो
बनाने के लिए यह और भी आवश्यक है।
सामग्री के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरण, भी विशेष आवश्यकता वाली लड़कियां हैं
कम्प्यूटर के प्रभावी इस्तेमाल के लिए स्क्रीन और उनकी तरफ उपयुक्त ध्यान दिया जाना । वर्गा, बी.पी. (2008)। एक पात्र स्मृतियों की
रीडर, सॉफ्टवेयर और एक दिन में हजारों चाहिए। लेकिन इस तरह के बच्चों के लिए एला
एलाइड प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली।
पने निकालने में सक्षम हाई स्पीड ब्रेल प्रिंटर
2. चौहान, आर.एम. (1994) प ऑफ स्पिरिट,
आवश्यक हस्तक्षेप अलग तरह का है और
कोणार्क प्रकाशन, नवी दिल्ली।
शामिल हैं। यह सही मायने में दिलचस्प और दृष्टि दिव्यांगता वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए 1 चौहान, आर.एस. (199291 दृष्टि रिव्यांगों के
क्रांतिकारी था। 1994 में यूनेस्को के शिक्षा कठिनाई का स्तर अत्यधिक है। अत: अधिक
लिए शिक्षा संबंधी सेवाओं का घटनाक्रम,
के अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण से तैयार दिव्यांगता वाले बच्चों की शिक्षा की जरूरतों
आर.एस. चौहान (शिक्षा). रेडबुक फार ।
टीचर्स ऑफ विजुअली रेडीकपड, राष्ट्रीय दृष्टि
सालाना वक्तव्य के बाद, भारत सरकार ने को ध्यान में रखा जाना चाहिए और पर्याप्त दिव्यांगजन संस्थान, देहरादून।
दिव्यांग बच्चों के लिए अन्य बच्चों के समान तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। 4 अहूजा, एस.सी. (1987)| शिक्षा के पथ
शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने और उन्हें शुरू इसके अतिरिक्त, दिव्यांग व्यक्तियों
प्रदर्शक और भारत में दृष्टि दिव्यांगजन का
पुनर्वासा टि दिव्यांगजनों की सेवाओं की
करने के लगातार प्रयास किए। निश्चित तौर को खरीद, सहायक उपकरणों की फिटिंग
पर, इस आदर्श परिवर्तन को सफल बनाने के और उपकरण योजना के लिए सहायता में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत पत्र।
लिए विशेष संसाधनों की व्यवस्था और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए वित्तीय 5. भारत में दृष्टि दिव्यांगता पर रिपोर्ट (1944)|
भारत सरकार, नई दिल्ली ।
प्रबंध किए गए।
सहायता देना शामिल है। अन्य पहलों के ।
6. दृष्टि दिव्यांगजनों के लिए कार्य के पचास वर्ष
कुछ चुनिंदा जिलों में 1990 के मध्य जरिये, देश में हाई स्पीड ब्रेल प्रिंटिंग संयंत्र
(1952)| भारत सरकार, नई दिल्ली ।
में विश्व बैंक की सहायता से जिला प्राइमरी के लिए पूंजी लगाई गई है। यदि इनका 7, भारती बेल पर नियम पुस्तिका (1980)। राष्ट्रीय
शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत करने के साथ उचित तरीके से और तर्कसंगत इस्तेमाल .
पांडे, आर. एस., आडवाणी, एल. (1995)1
ही, 21वीं शताब्दी में सर्व शिक्षा अभियान किया गया, तो किसी भी अवस्था में ब्रेल पसंपक्टिमा एडडिसेबिलिटी रिहबोलिटेशना
(एसएसए) और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा सामग्री की कोई कमी नहीं होगी।
विकास पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।
‘प्रोग्राम ऑफ हेप्यूटिंग इंडियन टीचर्स ऑफर
न केवल विभिन्न क्षमताओं के बेल
अभियान (आरएमएसए) को आकार लेते
साइंड फार र पकिना’ टीचर्स ट्रेनिंग कोर्स-
हुए देखा गया और इसे अखिल भारतीय उत्पादक, कम रोशनी वाले बच्चों के लिए
र फॉलो अप स्टडी (1978)। राष्ट्रीय हरि
दिव्यांगजन एसोसिएशन, बम्बई।।
मैग्नीफायर, यहां तक कि पेपर रहित बेल
स्तर पर लागू किया गया। दोनों अभियानों में
दृष्टि दिव्यांगता वाले बच्चों को प्रेरित करने पाठक और लेखक हाल ही में हमारे देश 10. दिव्यांग बच्चों के लिए समेकित शिक्षा योजन
(1992)| मानव संसाधन विकास मंत्रालय,
के लिए आवश्यक अंग थे। इसमें बच्चों में आए हैं। पेपर रहित पाठक लेखक एक
के लिए वित्तीय सहायता, संसाधन सामग्री इलैक्ट्रॉनिक उपकरण है जिसमें डेटा एक ॥. दिव्यांग व्यक्तियों के लिए छात्रवृत्तिया (19821
और उपकरण संबंधी विषयों की पढ़ाई के एसडी कार्ड में स्टोर होता है। एक बटन समाज कल्याण मंत्रालय, नई दिल्ली।
12 आडवाणी, एल (1987)/दृषि दिव्यांगजन के
लिए विशेष अध्यापकों की व्यवस्था थी। को दबाने से ब्रेल को पक्ति दर पक्ति पढ़ना ।
लिए सेवाओं की उत्पत्ति और विकास, सात
इन योजनाओं का विलय कर दिया गया संभव है। जरूरत पड़ने पर कोई भी व्यक्ति आडवाणी (ईडी), कार्यालय प्रबंध प्रशिक्षण
और इन्हें नया नाम ‘समग्र शिक्षा’ (विशेष लिखने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर की नियम पुस्तिका। अखिल भारतीय एप
दिव्यांगजन परिसंघ, नई दिल्ली।
आवश्यकता वाले बच्चों के लिए समग्र सकता है।
B. दिव्यांग व्यक्तियों के लिए (समान अवसर
शिक्षा) दे दिया गया। हालांकि ‘दिव्यांगता’ दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर
अधिकारों का संरक्षण और सम्पूर्ण भारोतरी)
शब्द के स्थान ‘विशेष आवश्यकता’ संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीआरपीडी) के कानून, 1995. (1996)1 भारत सरकार) AM
विधाग, नई दिल्ली।
शब्दावली का प्रयोग किया जाने लगा लेकिन करार को पूरा करने को ध्यान में रखते
14. दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार कानून, 2016
इसका व्यापक महत्व है। उदाहरण के लिए हुए, भारतीय संसद ने दिव्यांग व्यक्तियों के
(2016)1 विधि और व्याभय मंत्रालय,
जनजातीय समुदायों अथवा अल्पसंख्यकों में अधिकार (आरपीडी) कानून, 2016 बनाया। दिल्ली।

 

 

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