दिव्यांग प्रेरक के रूप में एक लक्ष्य साधक

 

सर्वप्रथम न्यूज़ : जीवन में असफलताओं का दौर आता है घबराना पीछे मुड़ना दूसरों की बातों पर विचलित हो जाना अपने मनोभाव में कुंठा कुंठित भावना उत्पन्न कर लेना कर्मठ योद्धा के लिए उचित नहीं है| जीवन कठिनाइयों भरा होता है अपने कर्म वचन सिद्धि लक्ष्य तक पहुंचने का प्लान बनाने वाले को उसको पालन करने वाले को होने वाली परीक्षाओं में अपने को उपस्थिति देने वाले को प्रश्नों के साथ जद्दोजहद करने वाले को परिस्थितियां चाहे कोई भी आर्थिक परेशानी सही में परेशान करती है लेकिन उसमें से भी निकल कर अपने मनोभाव को एकत्रित करके लक्ष्य की तरफ देखते रहने वालों को ईश्वर के द्वारा आशीर्वाद एक दिन प्राप्त हो जाता है||

मैं यह क्यों कह रहा हूं यही सोच रहे हैं इसलिए क्योंकि आज इस वैश्विक महामारी के दौर में हम सभी अपने अपने घरों में बंद है कुछ कर नहीं पा रहे हैं जीवन जीने की आशा लेकर उम्मीद में बस भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं|| हम सब ने आइंस्टाइन डॉक्टर कलाम जाने अनगिनत लोगों की बायोग्राफी है उन्हों
उनके जीवन के बारे में हम सीख लेते हैं और अपने -अपने लक्ष्य तक पहुंच पाए तो चलिए छोटी सी उम्मीद मैं भी आपको अपने बारे में बता कर सुनाता हूं जिससे आपको भी एक नई ऊर्जा मिलेगी और उम्मीद करते हैं कि आप भी अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे | आइए हमारे साथ कुछ पल साझा करते हुए:-
आज मैं आपको अपनी एक छोटी की आपबीती सुनाता हूं, कहीं ना कहीं उत्पन्न इस महामारी का ही स्वरूप रह चुका है भारत में 80 के दशक में या उससे पहले इसका नाम पोलियो वायरस था इसके प्रभाव से अनगिनत भाई -बंधु ,शाखा अग्रज, अनुज सभी बंधु प्रभावित हुए हैं वर्ष 2011 की जनसंख्या के आधार पर बिहार राज्य के दिव्यांगों का प्रतिशत , संख्या की बात की जाए तो 23 लाख 31 हजार 800 के करीब रहे होंगे जब वह 9 प्रकार के आज21 प्रकार मानी जाती है इसमें तो या 5000000 से भी ऊपर हो जाए तो क्या हम सभी हार कर बैठ जाएं उत्तर आएगा “नहीं”||
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मैं भी उन्हीं में से एक सन 1983 इसवी मैं कहा जाए तो भारत सरकार विफलताओं का भी रोना रो चुका आज भी ग्रामीण परिपेक्ष में स्वास्थ्य की स्थिति दयनीय है ना तो कोई अस्पताल है स्वास्थ्य व्यवस्था दुरुस्त है कहने को सब व्यवस्था कागजों पर ही जमीनी हकीकत कुछ और ही है| मैं आज भी उस दिन को कभी नहीं भूल सकता हूं जब मुझे बचपन में पोलियो बीमारी हुई थी जिससे मेरे पैर खराब हो गए थे मैं चल नहीं पाता था किसी तरह से भाइयों की मदद से प्राथमिक शिक्षा गांव अचलपुर दरभंगा बिहार तत्पश्चात पटना स्थित राजकीय उच्च विद्यालय कंकड़बाग पटना, दसवीं की पढ़ाई पूरी की उसके बाद विश्व मगध विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ आर्ट्स समाजशास्त्रऑनर्स की पढ़ाई कर दिल्ली विश्वविद्यालय तक का सफर तय किया जहां से मैंने बैचलर ऑफ लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई कर उपाधि प्राप्त की| निरंतरता के साथ कठिनाइयों को सामना करते हुए प्रतियोगिता परीक्षाओं को देते हुए उम्मीदवारी साबित करता रहा कभी रिजल्ट में आ जाना तो कभी इंटरव्यू को भी पार कर जाना लाख असफलताओं के बावजूद भारत के विभिन्न राज्यों में अपनी उम्मीदवारी अनेकानेक विभागों में चाहे वह एसएससी ,डीआरडीओ, ईएसआईसी, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग अनगिनत नाम है जिनमें ज्यादातर लाइब्रेरी साइंस से संबंधित रहे हैं वर्ष 2011 में बैंक की पहली बार परीक्षा शायद इसलिए असफल हो गया मुझे आज जो पद दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड दिल्ली सरकार मिला है वह उसी के लिए हुआ था ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कई सालों की कड़ी मेहनत करते हुए मैं आज इस जगत में पुस्तकालय अध्यक्ष पद पर आसीन हूं और अपने कर्म वचन से भविष्य का निर्माण कर रहा हूं बहुत खुशी होती है और मैं दिव्यांग होते हुए भी अपने कर्म वचन से समाज व देश की सेवा कर रहा हूं ,मुझसे जो भी लोग जुड़े हैं मैं आपका भरोसा मनोबल नहीं टूटने दूंगा, जितना भी हो सकता है आपको मार्गदर्शन करता रहूंगा | आप लगे रहिए सफलता जरूर प्राप्त होगी ऐसा मेरा मानना है कि मैंने करके देखा शिक्षण विधि में इसे करके सीखना कहा जाता है||
मेरी आपबीती से शिक्षा लेंगे और मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, मैं इतना जानता हूं कभी उचित समय का उपयोग खाली नहीं जाता जाते- जाते बशर्ते आप उसके सामने अपने आप को कैसे रख पाते हैं विकट परिस्थितियों में की गई प्लानिंग आपको आपके लक्ष्य तक जरूर पहुंचाएगी||

यह उम्मीद देते हुए परम पिता परमेश्वर से हमारी यही कामना है सभी इस वैश्विक महामारी से उबर जाने और सभी लक्ष्य पर साधक रूप से पुनः व्यवस्थित हो जाएं चेहरे पर खुशी व्यवस्थित हो जाएं हर्षोल्लास के साथ खुशी-खुशी अपने -अपने जीवनयापन को प्राप्त करें ,आओ ऐसा देश बनाएं|||
इस परिदृश्य को लिखने का तात्पर्य है इसका वैसे छात्र-छात्राएं जो परीक्षा के माध्यम से या वैसे प्रतियोगी छात्र- छात्राएं रोजगार प्राप्ति के लिए संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं उनमें पॉजिटिव एनर्जी का संचार हो और सामाजिक परिस्थिति से विचलित ना हो घबराए नहीं सभी परिस्थितियां एक जैसी नहीं होती हैं एक ना एक दिन आपके द्वारा किया गया प्रयास आपको वह धीमी गति से प्राप्त हो जाता | अपने ईश्वर में असीम आस्था रखिए माता -पिता ,सामाजिक परिवेश मित्र ,बंधु आपको जिनसे भी प्रेरणा मिलती उनसे और जिनसे आपको चुनौती मिलती है उन्हें भी आत्मसात कीजिए क्योंकि कहीं ना कहीं वह जो आपके लिए जो वचन बोलते हैं वह आपके जीवन में उत्प्रेरक का काम करता है एक प्रकार की कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में करने लगती है और उसके चलते हम अपने लक्ष्य तक पहुंच जाते हैं | धन्यवाद
रत्नेश कुमार की कलम से

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